होली का हाहाकारी हाल: जब रंगों ने पहचान ही मिटा दी!
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार1 Apr 2025 (अंक: 274, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
होली, यानी रंगों का त्योहार! लेकिन सच कहूँ तो यह त्योहार कम, राष्ट्रीय पहचान संकट ज़्यादा है। इस दिन दुनिया में दो ही तरह के लोग बचते हैं—एक जो पहचान में आ रहे होते हैं और दूसरे जो होली खेलकर अपनी ही पहचान भूल चुके होते हैं!
अब हमने भी इस बार सोचा कि पति देव के साथ जोश में होली खेलेंगे। मगर हमें क्या पता था कि यह जोश हमारे लिए पहचानो तो जानें प्रतियोगिता बन जाएगा!
जब हमने ख़ुद को शीशे में देखा . . .!
होली की शुरूआत बहुत शानदार रही। हमने सोचा कि इस बार पति देव पर ऐसा रंग डालेंगे कि वो अगले साल तक छूटेगा ही नहीं। लेकिन, हाय रे विधि का विधान! जैसे ही हमने गुलाल उड़ाया, हवा उल्टी बहने लगी और सारा रंग हमारे ही ऊपर आ गिरा।
पति देव तो और भी आगे बढ़ गए—सीधे बाल्टी उठाकर उड़ेल दी! हमने डरते-डरते आईने में झाँका, तो ख़ुद से ही सवाल करने लगे, “हे भगवान! ये कौन है?” चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे इंद्रधनुष पर भूकंप आ गया हो!
उधर पति देव ख़ुश थे, “देखो, तुम्हें ऐसा रँगा है कि ख़ुद भी पहचान में नहीं आओगी!” और सच में, जब हमने दरवाज़ा खोला, तो पड़ोसी घबरा गए, “अरे, आप कौन?”
हम बोले, “अरे, मैं ही हूँ, तुम्हारी भाभी!”
पड़ोसी घबराए, “झूठ मत बोलो, हमारी भाभी ऐसी नहीं दिखतीं!”
अब बताइए, हमारी तो नागरिकता ही ख़तरे में आ गई थी!
गुजिया का गुमशुदा रहस्य
अब त्योहार है तो गुजिया भी ज़रूरी! हमने सुबह से मेहनत करके 100 गुजिया बना डालीं। हाथ तो इतने जल गए कि लग रहा था कि अब घर का सारा काम पैरों से ही करना पड़ेगा। मगर असली सदमा तो तब लगा जब देखा कि डिब्बा ख़ाली पड़ा है!
हमने पूछा, “भई, गुजिया कहाँ गई?”
घर के सभी सदस्य ऐसे मासूम बने बैठे थे, जैसे परीक्षा में नक़ल करते पकड़े गए हों। कोई जवाब नहीं दे रहा था, सबके चेहरे पर सिर्फ़ रंग और संदेह था।
आख़िरकार, बेटे ने क़ुबूल किया, “मम्मी, हमें लगा कि होली के रंगों की तरह गुजिया भी प्री-पेड सर्विस होती है, तो खा ली!”
अब हमारी हालत ऐसी थी कि न गुजिया बची, न हमारी कमर! जो सुबह तक सीधी थी, अब होली की रस्मों के बोझ से टेढ़ी हो गई थी।
दरवाज़ा खोलते ही ख़ुद को भी डर लग गया!
अब असली हंगामा तब हुआ जब होली ख़त्म होने के बाद हमने दरवाज़ा खोला। सामने से पति देव आ रहे थे, लेकिन उनका हुलिया देखकर हम ख़ुद ही डर गए।
कपड़े ऐसे फटे हुए थे कि बॉलीवुड में आइटम नंबर करने वाली ड्रेस भी शरमा जाए! चेहरे पर इतने रंग थे कि “नवरंग” फ़िल्म का रीमेक लग रहे थे!
हमने फ़ौरन दरवाज़ा बंद कर लिया।
पति देव ने पूछा“अरे, क्या कर रही हो?”
हमने पूछा, “तुम कौन हो, भैया?”
पति देव, “अरे, मैं तुम्हारा पति हूँ!”
हमने संदेह प्रकट किया, “झूठ मत बोलो, मैं अपने पति को पहचानती हूँ।”
पति देव मुस्कुराए, “अच्छा? फिर पहचानने के लिए क्या चाहिए?”
हमने कहा, “पहले आधार कार्ड दिखाओ!”
अब हमारी हालत ऐसी हो गई थी कि ख़ुद के घर में पहचान के लिए डॉक्युमेंट लग रहे थे!
होली का सबक: रंग खेलो, पर पहचान सँभालकर!
होली खेलने का मज़ा तो आया, लेकिन अब एक महीने तक रंग छुड़ाने की मेहनत करनी पड़ेगी! हमें तो शक है कि अब चेहरे का असली रंग पता करने के लिए फ़ॉरेंसिक टीम बुलानी पड़ेगी!
तो भाइयों और बहनों, होली ज़रूर खेलो, मगर पहचान गुम न होने दो! वरना अगले साल आप भी घर के दरवाज़े पर पहचान पत्र लेकर खड़े नज़र आएँगे!
“होली है!।”
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