शादी: एक पारिवारिक संस्कार या सार्वजनिक प्रदर्शन?
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य कविता डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार15 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
समाज में इन दिनों विवाह का मौसम नहीं,
“प्रतिष्ठा प्रदर्शन महोत्सव” चल रहा है।
जिस घर में बेटी का जन्म होता है,
वहाँ लोरी के साथ एक और पंक्ति जुड़ जाती है—
“बिटिया की शादी धूमधाम से करेंगे . . . ”
धूमधाम—
यानी पंडाल ऐसा कि बिजली विभाग भी चौंक जाए,
व्यंजन ऐसे कि संयुक्त राष्ट्र खाद्य संगठन सर्वे कर ले,
और मेहमान इतने कि जनगणना विभाग भ्रमित हो जाए।
विवाह अब दो आत्माओं का मिलन कम,
दो परिवारों की आर्थिक परीक्षा अधिक हो गया है।
एक अदृश्य न्यायालय बैठता है—
न्यायाधीश होते हैं पड़ोसी,
वकील होते हैं रिश्तेदार,
और फ़ैसला होता है—
“फलाँ के यहाँ इससे अच्छा था।”
बस, यहीं से शुरू होती है
प्रतिष्ठा की वह प्रतिस्पर्धा
जो कई बार प्रेम से अधिक
ऋणपत्रों को जन्म देती है।
लोग कहते हैं—
“शादी जीवन में एक बार होती है।”
सही कहा—
पर उसका क़र्ज़ कई बार जीवन भर होता है।
अतिथि आते हैं—
मानो किसी पाँच सितारा सम्मेलन में पधारे हों।
सीधे भोजन क्षेत्र में प्रवेश,
प्लेट का विधिवत निरीक्षण,
तीन बार मिठाई का पुनरावलोकन,
और अंत में लिफ़ाफ़ा देकर
कर्त्तव्य की इतिश्री।
दूल्हा-दुल्हन मंच पर बैठे हैं,
पर मुख्य आकर्षण वे नहीं—
“लाइव काउंटर” है।
किसी ने पूछा—
“बेटी कैसी है?”
उत्तर मिला—
“देखिए, पचास डिश रखी हैं।”
घर के भीतर
माँ की चिंता है—
“इतना ख़र्च ठीक तो है?”
पिता की चुप्पी में
बैंक की ब्याज दरें बोल रही हैं।
पर समाज कहता है—
“प्रतिष्ठा का सवाल है।”
प्रतिष्ठा!
कितना सुंदर शब्द है—
जो धीरे-धीरे
परिवारों की नींव खा जाता है।
आज दिखावे की यह दौड़
इतनी तीव्र हो गई है
कि कई घरों में
विवाह से पहले ही तनाव जन्म ले लेता है।
बहस होती है—
“फलाँ के यहाँ LED स्क्रीन थी।”
“हमारे यहाँ क्यों नहीं?”
और कभी-कभी—
वही विवाह,
जिसका उद्देश्य दो जीवनों को जोड़ना था,
घर के भीतर दरारों का कारण बन जाता है।
क़र्ज़ की किश्तें
जब मासिक दस्तक देती हैं,
तब मेहमानों की तालियाँ
सुनाई नहीं देतीं।
जो लोग उस रात
सात प्रकार के पनीर का स्वाद लेकर गए थे,
वे यह नहीं पूछते—
“किस्त भर पाए क्या?”
दिखावे की यह महामारी
धीरे-धीरे घरों को भीतर से खोखला कर रही है।
एक ओर दहेज़ का बोझ,
दूसरी ओर आयोजन की प्रतिस्पर्धा—
और बीच में दबा हुआ
मध्यमवर्गीय आत्मसम्मान।
समाज की विडंबना देखिए—
जो सादगी से विवाह करे,
उसे कहा जाता है—
“कुछ कमी रह गई क्या?”
और जो वैभव में डूब जाए,
उसे कहा जाता है—
“वाह! क्या आयोजन था!”
पर कोई यह नहीं पूछता—
“घर सुरक्षित रहा या नहीं?”
शादी का मंडप
कभी संस्कारों का प्रतीक था—
अब कई बार
सोशल मीडिया की पृष्ठभूमि बन गया है।
हम भूल गए हैं—
विवाह का वैभव
फूलों की सजावट में नहीं,
भावों की सजलता में है।
सच तो यह है—
विवाह का असली उत्सव
उन कुछ चेहरों के साथ है
जो सच में आपके सुख-दुख में खड़े रहें।
शेष भीड़—
केवल ताली बजाती है,
और आगे बढ़ जाती है।
प्रश्न यह नहीं कि ख़र्च क्यों?
प्रश्न यह है—
क्या वह ख़र्च आपके जीवन को समृद्ध करता है
या केवल एक रात को चमकदार बनाता है?
आज आवश्यकता है
सामाजिक साहस की।
कोई तो कहे—
“हम सादगी से करेंगे।”
क्योंकि घर की शान्ति
किसी भी पंडाल से बड़ी है,
और परिवार की स्थिरता
किसी भी आतिशबाज़ी से अधिक उज्ज्वल।
विवाह—
यदि प्रदर्शन बन गया,
तो संबंधों की जड़ें सूख जाएँगी।
पर यदि संस्कार बना रहे—
तो कम दीपों में भी
पूरा घर प्रकाशित रहेगा।
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