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माता–पिता की वृद्धावस्था: एक मौन विलाप

 

वृद्धावस्था—
जो कभी अनुभव का मुकुट थी, 
आज समाज की गलियों में
एक अभिशाप-सी घूमती है। 
देखो उन माता–पिता को, 
जो साँसें गिनते हैं, दिन गिनते हैं, 
दो वक़्त की रोटी के लिए तरसते हैं—
वे ही हाथ
जिन्होंने हमें जीवन दिया, 
आज काँपते हैं विवशता में। 
अपने ही घर में
वे पराए हो गए हैं, 
जैसे मेहमान हों
उन दीवारों में
जिन्हें उन्होंने अपने सपनों से बनाया था। 
ममता की ठंडी छाँह
अब आँसुओं की धारा बन गई है, 
आँखें बहती रहती हैं—
करुणा के किसी तट की खोज में। 
जिस बच्चे को
मैंने अपनी बाँहों में झुलाया, 
दिल की धड़कनों से सुलाया, 
आज वह
नज़रें चुराकर
मेरे पास से निकल जाता है। 
जिसे मैंने
अपनी भूख छिपाकर खिलाया, 
अपना अंतिम कौर
उसके हाथ में रखा, 
आज उसके पास
मुझसे बात करने का समय नहीं। 
जिस हाथ ने
चलना सिखाया था, 
जो कभी मज़बूत और आश्वस्त था, 
आज वही हाथ
अकेला काँपता है—
सहारे की प्रतीक्षा में। 
बेटा कहता है—
धीमे स्वर में, पर कठोर सच के साथ, 
“घर छोटा है माता–पिता के लिए।” 
और कहीं
एक पत्नी
वृद्धाश्रम का नाम लेकर
मुस्कुरा देती है। 
आँगन, 
जहाँ कभी माँ की हँसी
सुबह की घंटियों-सी गूँजती थी, 
आज चुप है—
दीवारें भी
आँसू सुनती हैं। 
पिता—
जो कभी परिवार की रीढ़ थे, 
गर्जना-से मज़बूत, 
आज समय के बोझ तले
झुक गए हैं, 
दर्द को शब्द नहीं मिले। 
माँ—
जिसका स्पर्श
हर पीड़ा हर लेता था, 
आज उपेक्षा की
अदृश्य आग में
धीरे-धीरे जल रही है। 
यह ठहरने का समय है, 
सोचने का समय है, 
जागने का समय है—
कहीं यह पवित्र रिश्ता
हमारी असंवेदनशीलता में
टूट न जाए। 
माता–पिता
स्वर्ग का द्वार हैं—
उनके चरण मत छोड़ो। 
उनके बिना
जीवन अर्थहीन है—
उनके अस्तित्व को
मिटने मत दो। 
युवा मनो, 
समय रहते चेतो। 
संस्कारों का दीप
अपने भीतर जलाओ। 
उठो—
और अपने माता–पिता को
हृदय से लगा लो। 
कहीं ऐसा न हो
कि उनके काँपते होंठ
यह कहने को विवश हो जाएँ—
“हमने तुम्हें जीवन दिया, 
पर हमें
बूढ़ा होने का अधिकार
न मिला।” 
यही है
जीवन की यात्रा—
जब तक
केवल परछाइयाँ
शेष न रह जाएँ। 

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