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टीवी डिबेट: बहस कम, तमाशा ज़्यादा

 

आजकल टीवी डिबेट देखकर लगता है कि हम किसी अखाड़े में आ गए हैं, जहाँ एक-दूसरे पर ज़ुबानी लात-घूँसे चल रहे हैं। विषय क्या है, यह तो भगवान जाने, लेकिन एंकर ऐसे चीखती हैं जैसे स्टुडियो में ऑक्सीजन ख़त्म होने वाली हो। “बताइए! बताइए! हाँ या ना?” अब भइया, मुद्दे की बात कौन करे जब ‘चिल्लाओ प्रतियोगिता’ में ही नंबर लाने हों? 

समस्याओं की बात? छोड़िए जनाब, वो तो डिब्बे में बंद पड़ी हैं। देश की उन्नति? वो भी पैकिंग में सील कर दी गई है। असली मुद्दे लाने से टीआरपी जो गिर जाएगी! अब जनता पेट्रोल, महँगाई, बेरोज़गारी पर चिंतित हो या नहीं, लेकिन टीवी पर यह तय किया जाता है कि किस नेता ने किसे क्या कहा और किसे क्या कहना चाहिए था। 

सबसे मज़ेदार होता है भ्रष्टाचार पर डिबेट! भ्रष्टाचारी ही विशेषज्ञ बनकर आ जाते हैं और इतने तर्क-वितर्क करते हैं कि लगता है इन्हें तो कोई मैडल मिलना चाहिए! एक से एक घोटालेबाज़, रिश्वतख़ोर और घूसख़ोर ऐसे नैतिकता पर भाषण देते हैं जैसे गाँधी जी के प्रत्यक्ष शिष्य हों। 

एंकर बहस नहीं करातीं, बल्कि एक ख़ास स्क्रिप्ट पर काम करती हैं। पहले ‘गर्मागर्म’ माहौल बनाएँगी, फिर चीख-चीखकर एक पक्ष को उकसाएँगी, फिर दूसरे को धमकाएँगी, और आख़िर में ख़ुद जज बनकर फ़ैसला सुना देंगी। “ब्रेक के बाद देखिए, कौन जीता? कौन हारा?” अरे बहनजी, मुद्दा ही समझ में नहीं आया तो जीत-हार कैसी? 

आख़िर में जनता क्या पाती है? एक सिरदर्द, थोड़ी बहुत हँसी, और ढेर सारी निराशा! क्योंकि असली समस्याएँ वही हैं जहाँ थीं—टीवी स्टुडियो के बाहर, जनता की ज़िन्दगी में। 

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