टीवी डिबेट: बहस कम, तमाशा ज़्यादा
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
आजकल टीवी डिबेट देखकर लगता है कि हम किसी अखाड़े में आ गए हैं, जहाँ एक-दूसरे पर ज़ुबानी लात-घूँसे चल रहे हैं। विषय क्या है, यह तो भगवान जाने, लेकिन एंकर ऐसे चीखती हैं जैसे स्टुडियो में ऑक्सीजन ख़त्म होने वाली हो। “बताइए! बताइए! हाँ या ना?” अब भइया, मुद्दे की बात कौन करे जब ‘चिल्लाओ प्रतियोगिता’ में ही नंबर लाने हों?
समस्याओं की बात? छोड़िए जनाब, वो तो डिब्बे में बंद पड़ी हैं। देश की उन्नति? वो भी पैकिंग में सील कर दी गई है। असली मुद्दे लाने से टीआरपी जो गिर जाएगी! अब जनता पेट्रोल, महँगाई, बेरोज़गारी पर चिंतित हो या नहीं, लेकिन टीवी पर यह तय किया जाता है कि किस नेता ने किसे क्या कहा और किसे क्या कहना चाहिए था।
सबसे मज़ेदार होता है भ्रष्टाचार पर डिबेट! भ्रष्टाचारी ही विशेषज्ञ बनकर आ जाते हैं और इतने तर्क-वितर्क करते हैं कि लगता है इन्हें तो कोई मैडल मिलना चाहिए! एक से एक घोटालेबाज़, रिश्वतख़ोर और घूसख़ोर ऐसे नैतिकता पर भाषण देते हैं जैसे गाँधी जी के प्रत्यक्ष शिष्य हों।
एंकर बहस नहीं करातीं, बल्कि एक ख़ास स्क्रिप्ट पर काम करती हैं। पहले ‘गर्मागर्म’ माहौल बनाएँगी, फिर चीख-चीखकर एक पक्ष को उकसाएँगी, फिर दूसरे को धमकाएँगी, और आख़िर में ख़ुद जज बनकर फ़ैसला सुना देंगी। “ब्रेक के बाद देखिए, कौन जीता? कौन हारा?” अरे बहनजी, मुद्दा ही समझ में नहीं आया तो जीत-हार कैसी?
आख़िर में जनता क्या पाती है? एक सिरदर्द, थोड़ी बहुत हँसी, और ढेर सारी निराशा! क्योंकि असली समस्याएँ वही हैं जहाँ थीं—टीवी स्टुडियो के बाहर, जनता की ज़िन्दगी में।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | वीरेन्द्र बहादुर सिंहनवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस…
60 साल का नौजवान
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | समीक्षा तैलंगरामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…
(ब)जट : यमला पगला दीवाना
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | अमित शर्माप्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और असली हक़ीक़त
- अपराध की एक्सप्रेस: टिकट टू अमेरिका!!
- अस्त्र-शस्त्र
- आओ ग़रीबों का मज़ाक़ उड़ायें
- आहार दमदार आज के
- एमबीबीएस बनाम डीआईएम
- कचरा संस्कृति: भारत का नया राष्ट्रीय खेल
- काम क्यों करें?
- गर्म जेबों की व्यवस्था!
- चंदा
- जनसंख्या नियंत्रण: अब कोई योजना नहीं, बस हालात
- झुकना
- टमाटर
- टीवी डिबेट: बहस कम, तमाशा ज़्यादा
- ड्रम युग: आधुनिक समाज का नया फ़र्नीचर
- ताक़तवर कौन?
- देश के दुश्मनों की देशभक्ति
- पेट लवर पर होगी कार्यवाही
- मज़ा
- यमी यमी मिल्क राइस
- रीलों की दुनिया में रीता
- रफ़ा-दफ़ा
- विदेश का भूत
- विवाह आमंत्रण पिकनिक पॉइंट
- विवाह पूर्व जासूसी अनिवार्य: वरमाला से पहले वेरिफ़िकेशन
- संस्कार एक्सप्रेस–गंतव्य अज्ञात
- सावित्री से सपना तक . . .
- होली का हाहाकारी हाल: जब रंगों ने पहचान ही मिटा दी!
- क़लम थामी जब
- फ़ंड का रहस्यमयी कुंड: सरकार भेजती है, धरती निगल जाती है!
कविता
- अपने हक़ को जाने
- एक सीट ख़ाली है
- कान्हा
- गांधारी का मौन रहना
- नदी
- नदी और नारी
- पन्ना धाय
- पापा की यादें
- प्रार्थना
- बस रह गई तन्हाई
- माता–पिता की वृद्धावस्था: एक मौन विलाप
- मानव तुम कहलाते हो
- शिक्षक
- सभ्यता के कफ़न में लिपटी हैवानियत: एक महाकाय व्यंग्य
- सावन आया
- सावन मनभावन
- स्त्री—हर युग में कटघरे में
- हमारे वृद्ध
- हिंदुस्तान महान है
सांस्कृतिक आलेख
हास्य-व्यंग्य कविता
अनूदित कविता
नज़्म
चिन्तन
कहानी
लघुकथा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं