अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बसंत पंचमी: जब ऋतु नहीं, चेतना बदलती है

 

भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है। यहाँ पर्व उत्सव नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले संकेत होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है—जो ऋतु परिवर्तन की सूचना से आगे बढ़कर विचार, विवेक और मूल्यबोध के पुनर्जागरण का संदेश देता है। 

आज जब समाज तेज़ी से बदल रहा है, तकनीक आगे बढ़ रही है और जीवन की गति बढ़ चुकी है, तब बसंत पंचमी हमें ठहरकर यह सोचने को विवश करती है कि क्या हमारी प्रगति के साथ-साथ संवेदनशीलता, ज्ञान और विवेक भी बढ़ रहे हैं? 

ऋतु का परिवर्तन और समाज का संकेत

बसंत पंचमी शिशिर ऋतु की जड़ता को तोड़कर बसंत ऋतु के आगमन का उद्घोष करती है। प्रकृति में पीले फूल, नई कोंपलें और जीवन की हलचल यह स्पष्ट संकेत देती है कि ठहराव स्थायी नहीं होता। यही संदेश समाज के लिए भी है—निराशा, जड़ता और असंतुलन से बाहर निकलने का। 

आज जब पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन जैसे प्रश्न सामने हैं, तब बसंत पंचमी हमें प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाती है। यह पर्व याद दिलाता है कि विकास वही सार्थक है, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे। 

माँ सरस्वती और ज्ञान का वास्तविक अर्थ

बसंत पंचमी को ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना का पर्व माना जाता है। पर यह आराधना केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सरस्वती का अर्थ है—ज्ञान के साथ विवेक, बुद्धि के साथ करुणा और शिक्षा के साथ नैतिकता। 

आज शिक्षा का बड़ा हिस्सा अंकों, डिग्रियों और रोज़गार तक सिमट गया है। प्रश्न यह है कि क्या यह शिक्षा हमें बेहतर मनुष्य बना रही है? क्या यह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दे रही है? बसंत पंचमी इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करती है। 

विद्यार्थी, शिक्षा और भविष्य

भारत का भविष्य उसके विद्यार्थियों के हाथों में है। बसंत पंचमी पर विद्यारंभ की परंपरा यह संकेत देती है कि शिक्षा केवल करियर का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रक्रिया है। 

आज जब युवा वर्ग तनाव, प्रतिस्पर्धा और असमंजस से घिरा है, तब यह पर्व उन्हें संतुलन, धैर्य और आत्मविश्वास का संदेश देता है। 

भारतीय संस्कृति पर्वों की संस्कृति है—ऐसी संस्कृति, जहाँ हर उत्सव केवल तिथि नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का प्रतीक होता है। इन्हीं पावन पर्वों में बसंत पंचमी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह पर्व प्रकृति, ज्ञान, कला और मानव चेतना—चारों के सुंदर समन्वय का उत्सव है। बसंत पंचमी न केवल ऋतु परिवर्तन की सूचना देती है, बल्कि यह मनुष्य को आलस्य से जागरण और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का आह्वान भी करती है। 

बसंत पंचमी का सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्त्व

बसंत पंचमी मुख्यतः माँ सरस्वती, जो ज्ञान, विद्या, बुद्धि, संगीत, कला और विवेक की अधिष्ठात्री देवी हैं, की आराधना का पर्व है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि इसी दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ और संसार को शब्द, स्वर और ज्ञान का वरदान प्राप्त हुआ। इसी कारण यह दिन विद्यार्थियों, शिक्षकों, लेखकों, कवियों, कलाकारों और न्याय-चिंतन से जुड़े व्यक्तियों के लिए अत्यंत पावन माना गया है। 

इस दिन विद्यालयों, महाविद्यालयों और घरों में पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-सामग्री की पूजा की जाती है। यह परंपरा हमें यह स्मरण कराती है कि ज्ञान केवल अर्जन की वस्तु नहीं, बल्कि साधना और विनम्रता का विषय है। 

ऋतु परिवर्तन और बसंत पंचमी

बसंत पंचमी शिशिर ऋतु के अंतिम चरण में आती है और इसके साथ ही बसंत ऋतु के आगमन की घोषणा मानी जाती है। बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ कहा गया है, क्योंकि इसमें न अत्यधिक ठंड होती है, न तीव्र गर्मी। यह ऋतु संतुलन, मधुरता और सौंदर्य की प्रतीक है। 

प्रकृति में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, आम के बौर सुगंध बिखेरते हैं, खेतों में हरियाली और पीताभ आभा छा जाती है। यही कारण है कि बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं और पीले व्यंजन बनाए जाते हैं—यह रंग उत्साह, ऊर्जा, आशा और नवजीवन का प्रतीक है। 

बसंत पंचमी और विद्यार्थियों का जीवन

बसंत पंचमी का विद्यार्थियों के जीवन में विशेष महत्त्व है। भारतीय परंपरा में इस दिन विद्यारंभ संस्कार किया जाता है। छोटे बच्चों को अक्षर-ज्ञान इसी दिन से प्रारंभ कराया जाता है। यह विश्वास केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है—क्योंकि बसंत ऋतु स्वयं स्फूर्ति, जागरूकता और सकारात्मकता का संचार करती है। 
इस पर्व से विद्यार्थियों को अनेक प्रकार के लाभ होते हैं—

एकाग्रता और स्मरण शक्ति का विकास: सरस्वती पूजा के माध्यम से विद्यार्थी मन को स्थिर करने और लक्ष्य पर केंद्रित रहने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। 

आत्मविश्वास और बौद्धिक अनुशासन: यह पर्व यह सिखाता है कि ज्ञान केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण ढंग से जीने की कला है। 

नैतिक मूल्यों की स्थापना: माँ सरस्वती का श्वेत स्वरूप पवित्रता, सत्य और संयम का प्रतीक है—जो विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में सहायक होता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

सांस्कृतिक आलेख

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

हास्य-व्यंग्य कविता

अनूदित कविता

नज़्म

चिन्तन

कहानी

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं