नशों की बारात
अनूदित साहित्य | अनूदित कविता डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
जैसे ही नया साल आया,
वैसे ही भीतर ऊर्जा ने कुंडी खटखटाई—
मन बोला, “उठो! अब पुराने बहानों की करो विदाई।”
और हम उठ खड़े हुए . . .
नई-नई क़समों के साथ,
पुराने तानों को पुराने साल में ही छोड़कर।
लोग तो कहते रहे—
तुम ऐसी हो, तुम वैसी हो,
तुम मैं यह कमी है,
तुम वो काम ठीक से नहीं कर पाती।
हमने भी मन ही मन कहा—
“ठीक है भैया, कहते रहो,
यह दुनिया कहने वालों की है,
और हम . . . ईश्वर को सुनने वालों की।”
अब नशा रहेगा तो सिर्फ़ एक—
ईश्वर के चरणों का।
वहीं डूबेंगे, वहीं उतराएँगे।
जब से यह नशा चढ़ा है,
जीवन ने शिकायत करना छोड़ दिया है,
और मुस्कुराना सीख लिया है।
अब यह मूर्ख मन भी समझ गया है—
ऊपर देखने वाला बैठा है,
तो नीचे की फुसफुसाहटों का
हिसाब रखने की ज़रूरत नहीं।
एक बार आस पास की बुराई को छोड़ कर
उसके चरणों में मन लगाए।
परिणाम हरि पर छोड़ दे।
चलिए दूसरे नशे की बात करते हैं—
किताबों का नशा
यह नशा बड़ा सलीक़ेदार होता है।
वृद्धावस्था में,
जब शरीर ठहरने लगता है
और दुनिया भटकाने लगती है,
तब किताबें हाथ पकड़ लेती हैं।
वे सच्ची मित्र हैं—
न शिकायत, न अपेक्षा।
अकेलेपन में भी
अकेलापन महसूस नहीं होने देतीं।
किताबें सागर हैं—
जितने गोते, उतने मोती;
हर बार नया, हर बार चमकदार।
कोई भी न साथ दे पर वे साथी बन जाती हैं।
शोहरत का नशा
यह नशा बड़ा ज़िद्दी होता है।
एक बार लगा तो मंज़िल पर पहुँचा कर ही स्वास लेता है।
हमारे दीनू काका की बेटी को ही देख लीजिए—
सरकारी गाड़ी, नाम-रुतबा,
उसे शोहरत की धूप में तपना था।
जब लोग सोते थे,
वह अपने सपनों को जगाती थी।
तपस्या रंग लाई,
और आज वह डीएसपी बन
सपनों को सलामी दे रही है।
शोहरत यूँ ही नहीं मिलती—
वह पसीने की स्याही से
क़िस्मत पर लिखा नाम होती है।
घूमने का नशा
जेब में फूटी कौड़ी न हो,
पर मन में यात्रा का नक़्शा हो—
तो आदमी मेहनत करके
चल ही पड़ता है।
जिसे प्रकृति से प्रेम होता है,
उसे घूमने का शौक़ होता है।
घूमने वाले को जगहों का ही नहीं,
ज़िंदगी का भी ज्ञान होता है।
कहते हैं उनकी उम्र लंबी होती है—
क्योंकि वे फ़ालतू प्रपंचों में
उलझते ही नहीं,
घूमते हैं, आनंद लेते हैं,
और विकार रास्ता भूल जाते हैं।
मोहब्बत का नशा
अब आप कहेंगे—
मोहब्बत तो जवान दिलों का रोग है।
अरे नहीं!
माता-पिता की मोहब्बत देखिए—
जो अपने जीवन की कमाई,
अपने सपने, अपने सुख—
सब बच्चों पर निछावर कर देते हैं।
दुनिया में जितने नशे हैं—
उनमें सबसे पुराना,
सबसे वैध और सबसे ज़िद्दी नशा—
माता-पिता की मोहब्बत का नशा है।
यह नशा बोतल में नहीं मिलता,
पर असर ऐसा कि उम्र भर उतरता ही नहीं।
माँ को देखिए—
बच्चा छींक दे तो डॉक्टर का नंबर डायल,
ख़ुद बीमार पड़े तो बोले,
“अरे कुछ नहीं, ठंडी हवा लग गई।”
यह वही मोहब्बत का नशा है,
जो ख़ुद की तकलीफ़ को
होम्योपैथिक बना देता है।
पिता जी का नशा तो और भी ख़तरनाक।
बेटा दो नंबर लाए—
“कोई बात नहीं, मेहनत करेगा।”
पड़ोसी का बच्चा टॉप करे तो
“उसका पेपर आसान आया होगा।”
नशा ऐसा कि
दुनिया के सारे तथ्य धुँधले
और अपना बच्चा HD क्वालिटी में दिखता है।
इस नशे में माता-पिता
बच्चे को राजा समझते हैं
और ख़ुद को प्रजा।
ख़ुद पुराना मोबाइल,
बच्चे को लेटेस्ट मॉडल—
क्योंकि मोहब्बत का नशा
EMI भी मुस्कुराकर भरवा देता है।
सबसे मज़ेदार बात यह कि
यह नशा ग़ैरक़ानूनी नहीं,
फिर भी नींद उड़ा देता है।
रात दो बजे भी फोन बजे—
“मम्मी . . . ”
बस, नशा सक्रिय!
नींद तुरंत सस्पेंड।
और हाँ,
इस नशे की कोई ‘रिहैब’ नहीं।
बच्चा बड़ा हो जाए,
शादी कर ले,
फिर भी माता-पिता बोले—
“खाना ठीक से खाया ना?”
बाक़ी नशे आदमी को गिराते हैं,
पर माता-पिता की मोहब्बत का नशा
आदमी को झुका देता है—
अपने बच्चों के आगे,
पूरी श्रद्धा के साथ।
देशभक्ति का नशा
देश-भक्ति का नशा सबसे पवित्र नशा होता है।
यह बोतल में नहीं भरता,
यह रग-रग में उतरता है।
यह नशा व्यक्ति को
अपने सुख से ऊपर
देश का स्वाभिमान रखना सिखाता है।
यही नशा था
जिसने नाज़ुक हाथों में तलवार थमा दी,
और कोमल हृदयों को वज्र बना दिया।
यदि यह नशा न होता,
तो इतिहास की शिलाओं पर
वीर नारियों और वीर सपूतों के नाम
स्वर्ण अक्षरों में कैसे लिखे जाते?
देश-भक्ति का नशा
नारे लगाने में नहीं,
कर्त्तव्य निभाने में दिखाई देता है।
जो बिना कुछ पाए
सब कुछ अर्पण कर दे—
समझ लीजिए,
वही इस नशे में डूबा हुआ है।
ईश्वर यह नशा
हर मन में बसाए,
ताकि देश केवल नक़्शे में नहीं,
दिलों में भी बसता रहे।
यह नशा ईश्वर सबको दे—
वरना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई,
अहिल्याबाई होलकर,
रानी दुर्गावती—
इतिहास के पत्थरों पर
अपने नाम अमर कैसे करतीं?
यह नशा रक्त में उतर जाए
तो व्यक्ति नहीं,
युग खड़े हो जाते हैं।
ईमानदारी का नशा
ईमानदारी का नशा बड़ा अजीब होता है मित्र,
इसे पीने वाला झुकना भूल जाता है।
न लालच की चाशनी असर करती है,
न डर की धमकी काम आती है।
ईमानदार आदमी हज़ारों भ्रष्टों की भीड़ में ऐसे चमकता है
जैसे अमावस की रात में एक अकेला दिया—
जिसे बुझाने वाले बहुत होते हैं,
पर बुझा पाना किसी के बस की बात नहीं।
भ्रष्टाचार से बनी इमारतें
ऊँची ज़रूर दिखती हैं,
पर उनकी नींव रेत की होती है।
एक दिन ईमानदारी की
हल्की-सी आँधी चलती है और
वे इमारतें अपने ही घमंड के मलबे में ढह जाती हैं।
ईमानदार व्यक्ति तालियाँ नहीं बजवाता,
वह चुपचाप अपना काम करता है।
उसके पास सिफ़ारिश नहीं होती,
पर आत्मसम्मान होता है।
उसकी जेब भले हल्की हो,
पर उसका सिर हमेशा सीधा रहता है।
ईमानदारी का नशा अंत तक साथ निभाता है—
न नौकरी छूटने से उतरता है, न पद जाने से।
और जब हिसाब का दिन आता है,
तब वही ईमानदारी सबसे मज़बूत गवाही बन जाती है।
इसलिए मित्र, अगर नशा करना ही है,
तो ऐसा नशा कीजिए
जिससे आईना देखने में कभी शर्म न आए।
खाना बनाने का नशा
यह नशा बड़ा घरेलू होता है।
ख़ुद खाएँ न खाएँ,
पर बनाकर खिलाने में
जो सुख मिलता है—
वह ज़ोमैटो-स्विग्गी के
डिस्काउंट में कहाँ!
आजकल तो
“आज मन नहीं है”
सबसे लोकप्रिय रेसिपी है।
ख़ुशक़िस्मत होते हैं वे पतिदेव
जिनकी पत्नियों को
खाना बनाने का नशा होता है—
वरना आजकल तो जोमैटो से ऑर्डर हो जाते हैं
स्विग्गी से ऑर्डर हो जाते हैं
व्यंग्य में कहें तो,
उनके घर में
भूख भी अनुशासन में रहती है।
तो मित्र,
नशा करिए—
पर ऐसा,
जो जीवन को हल्का करे,
मन को ऊँचा उठाए,
और चेहरे पर मुस्कान छोड़ जाए।
क्योंकि असली नशा वही है
जिससे होश बढ़े,
कम न हो।
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