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क्या हूँ मैं? 

एक किरण, 
चैतन्य के प्रकाश पर, 
बिखरी हई, 
मात्र एक किरण। 
 
क्या हूँ मैं? 
 
एक लहर, 
परम ब्रह्म के, 
असीमित सागर में, 
बनती हुई, 
मिटती हुई, 
एक लहर। 
 
क्या हूँ मैं? 
 
एक झोंका, 
हवा का, 
अनंत ईश्वर के, 
आकाश में। 
 
इतराती हुई, 
बल खाती हुई, 
मुस्कुराती हुई, 
लहराती हुई, 
इठलाती हुई, 
मिट जाती हुई। 
 
एक हिस्सा, 
अदना सा हिस्सा, 
इस असीमित, अनंत, 
आकाश का, 
सागर का, 
प्रकाश का। 
 
अनजान, 
इस बात से अनजान, 
कि इन लहरों के, 
झोकों के, 
या किरणों के, 
बनने का या मिटने का। 
 
ना तो हर्ष ही मनाता है, 
ये चैतन्य, 
ये सागर, 
ये आकाश, 
ये प्रकाश, 
और ना शोक ही। 

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