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अब पछताए होत का 

भोला का गाँव शहर से लगा हुआ है। एक किलोमीटर के लगभग चले नहीं कि शहर का क्षेत्र आरम्भ हो जाता है। उसके बाद इतना ही चलने पर भोला का स्कूल आ जाता है। भोला आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है। अभी पिछले साल तक पैदल ही शाला जाता था। दो किलोमीटर होता ही कितना है? बस यूँ गए और यूँ वापस आये। फिर ग्रामीण परिवेश में पला-बढ़ा भोला, उसको पैदल चलने में ही बड़ा आनंद आता था। उसे अपने दादाजी से हमेशा प्रेरणा मिलती थी जो फ़ुरसत के समय में देश के बाँके वीरों, शहीदों और क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनाते रहते थे। क्रांतिकारी तो अंग्रेज़ों से बचने के लिए गाँव-गाँव और शहर-शहर घूमते-फिरते थे। दिन भर में पचास-साठ किलोमीटर चलना मामूली बात थी। कभी-कभी तो ये लोग इससे भी ज़्यादा चल लेते थे। दादाजी बताते थे कि अपनी युवावस्था में वे भी बीस-पच्चीस किलोमीटर तक रोज़ पैदल चल लेते थे। घर से उनके खेत की दूरी ही पाँच किलोमीटर थी और दादाजी सामान्यतः दिन में दो चक्कर रोज़ मार लिया करते थे। उसकी दादी का मायका भी गाँव से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर था और दादाजी बताते हैं की वे दादी को लेने और छोड़ने पैदल ही जाते थे| ख़ैर अब तो दादाजी ने उसे साइकिल ले दी है। अब वह शाला साइकिल से ही जाता-आता है। दादाजी ने उसे एक ही बात समझाई है कि जहाँ तक बन सके दूसरों की सहायता करनी चाहिए। उचित मार्ग दर्शन देना ही बड़े बुज़ुर्गों का कर्तव्य होता है और छोटों का काम बड़ों के आदेशों का पालन करना और उनकी अच्छी बातों को आत्मसात करना होता है। भोला दादाजी की बातों को ध्यान से सुनता और आदेशों का पालन करता था। 

घर से शाला के बीच में सड़क किनारे सहदेव का घर पड़ता था। शाला जाते समय दोनों साथ हो लेते और वापस भी साथ-साथ ही आते थे|दोनों लँगोटिया यार थे। सहदेव थोड़ा मनमौजी स्वभाव का लड़का था। और किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता था। भोला सहदेव के घर से आते-जाते देखता था कि सहदेव की एक गाय और एक भैंस बिजली के खम्भे से बँधी रहती है। दोनों जानवर रस्सी के सहारे खम्भे के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। एक दिन शाम को दोनों शाला से लौट रहे थे तो भोला ने देखा कि सहदेव की भैंस बिजली के खम्भे से रगड़-रगड़ कर अपनी पीठ खुजला रही है। और रगड़ से बिजली का खम्भा ज़ोरों से हिल रहा है। खम्भे के ऊपर के तार भी झनझनाकर लहरा रहे हैं। 

"अरे सहदेव देखो, तुम्हारी भैंस खम्भे से रगड़कर पीठ खुजा रही है और खम्भा ज़ोरों से हिल रहा है कहीं खम्भे में करेंट न आ जाये," भोला ने सतर्क होते हुए सहदेव से कहा। 

"क्या मज़ाक करते हो, खम्भा हिलने से क्या उसमें करेंट आ जाता है? हम तो कई सालों से इसी खम्भे में जानवर बाँधते आ रहे हैं कभी भी करेंट नहीं लगा जो आज लग जाएगा," सहदेव ने बड़ी ही लापरवाही से कहा। 

नहीं सहदेव खम्भों में करेंट आ जाता है। ऊपर जो बिजली के तार लगे हैं, उनमें करेंट रहता है। खम्भे हिलने से यदि तार खम्भे में अथवा उसके क्रास आर्म जिस पर इंसुलेटर रखकर तार बाँधे गए हैं छू जाता है तो सारे खम्भे में करेंट आ जाता है," भोला ने समझाया। 

"फिर तो हर खम्भे में करंट आ जाना चाहिए," सहदेव ने मूर्खता पूर्ण प्रश्न किया। 

"ऐसे करेंट नहीं आता यार, पूरा खम्भा सुरक्षित है, खम्भे में चीनी मिटटी के इंसुलेटर लगे हैं और उसके ऊपर तार बँधे रहते हैं, सामान्यतः खम्भे में करंट नहीं आता।"

"लेकिन ये इंसुलेटर क्या बला है?"सहदेव बीच में ही बोल पड़ा। 

"यार इतना भी नहीं जानते, इंसुलेटर कुचालक होता है। जिसमें करेंट नहीं बहता," भोला ने समझाया। 

"हाँ मित्र स्मरण तो आ रहा है, अपनी विज्ञान की किताब में कुचालक, सुचालक ये शब्द लिखे तो हैं," सहदेव दिमाग़ पर ज़ोर डालते हुए बोला। 

"देखो दो तरह की वस्तुएँ होती हैं, एक चालक जिसमें से होकर करेंट बहता है और दूसरी कुचालक जिसमें करेंट नहीं बहता। तारों में से करंट बहता है इसलिए वह चालक कहलाया। और इंसुलेटर में से करेंट नहीं बहता वह कुचालक कहलाया।"

भोला फिर बोला, "ऊपर देखो तीन इंसुलेटरों पर अलग-अलग तीन तार बँधे हैं जो आगे दूसरे खम्भों की तरफ़ जा रहे हैं। ये इंसुलेटर एक लोहे की मज़बूत V आकार की भुजा पर बँधे हैं और यह भुजा खम्भे से बँधी है। इंसुलेटर पर तार रखे हैं इसलिए खभे पर करेंट नहीं आ रहा है," भोला समझा रहा था। 

"जब तार इंसूलेटर पर बँधे हैं तो फिर करेंट..." सहदेव बीच में फिर बोल पड़ा। 

"पूरी बात तो सुनो मित्र, अभी तो करेंट नहीं आ रहा है। किन्तु तार यदि इंसुलेटर से निकलकर लोहे के हिस्से पर गिर पड़ा तो करेन्ट आएगा कि नहीं? यदि तार टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा तो करेंट नहीं आएगा क्या? यदि इंसुलेटर फूट गया और तार लोहे वाले किसी भाग में गिर पड़ा तो करेंट आएगा कि नहीं?" भोला ने फिर समझाने का प्रयास किया। 

"लेकिन यह तो तब होगा जब इंसुलेटर फूटेगा अथवा तार टूटेगा। अभी तक तो ऐसा कभी नहीं हुआ। जब होगा देखा जायेगा," सहदेव ने बात टाल दी। 

दूसरे दिन जैसे ही भोला सहदेव को लेने उसके घर के सामने रुका तो देखा उसके घर के सामने भीड़ लगी है। गाँव के पंद्रह-बीस लोग एकत्रित हैं। उसने अपनी साईकिल एक तरफ़ टिकाई और पास जाकर देखा तो पाया खम्भे के नीचे सहदेव की भैंस मरी पड़ी है। और थोड़ी दूर पर उसकी गाय भी अंतिम साँसें लेती हुई मुँह से झाग निकालते हुए फड़फड़ा रही है। दोनों के पैर बिजली के तारों से उलझे हुए हैं। सहदेव दौड़कर भोला के पास आ गया और फफककर रोने लगा। 

"तुमने ठीक ही कहा था। मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी और यह नुक़सान हो गया," सहदेव के बापू भी पास आ गए. "बेटा बीस हज़ार की भैंस और तीस हज़ार की गाय, सब मिलाकर पचास हज़ार का नुक़सान हो गया। एक-एक रुपया जोड़कर दोनों जानवर ख़रीदे थे। रोज़ी-रोटी का आधार ही छिन गया।" सहदेव के बापू की आँखों में आँसू आ गए। 

"काकाजी यह तो गनीमत रही कि आपके जानवर ही मरे हैं; अगर आसपास आप सहदेव अथवा घर का कोई और सदस्य भी होता तो वह भी तार की चपेट में आकर अपनी जान गँवा सकता था। भगवान को धन्यवाद दो कि बहुत बड़ा हादसा होते-होते बच गया। बिजली किसी को नहीं छोड़ती। सावधानी से उपयोग करो तो ही लाभ होता है अन्यथा जानलेवा तो है ही। बिजली का प्रयोग बहुत ही सावधानी से करना चाहिए," भोला फिर समझाने लगा।

सहदेव सोच रहा था काश भोला की बात मान ली होती और जानवरों को खम्भे से न बाँधने की सलाह बापू को दे दी होती तो यह दुर्घटना नहीं होती। लेकिन अब क्या हो सकता था। 

"अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत" 

खम्भे के ऊपर बंधी टीन की प्लेट पर दो हड्डियों के बीच मानव खोपड़ी का चित्र जैसे सहदेव को चिढ़ा रहा था। उसने आज ठीक से देखा था कि चित्र के नीचे यह भी लिखा है। 
सावधान 
ख़तरा 11000 वोल्ट 

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