चिंगारी
काव्य साहित्य | कविता डॉ. ज़हीर अली सिद्दीक़ी15 Feb 2021 (अंक: 175, द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)
क्षितिज धूमिल सा दिखा
धुआँ उठा होगा कहीं
धधकती प्रचण्ड ज्वाला।
चिंगारी लगी होगी कहीं॥
लपट जो फैली हुई है
दिल के कोने का धुआँ
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उमड़े।
चिंगारी लगी होगी कहीं॥
एक से आरम्भ होकर
धुँए सा प्रसार इसका
विद्रोह की लपटें हैं फैली।
चिंगारी लगी होगी कहीं॥
तोड़ दीं लगाम ख़ुद से
एकजुट हुँकार भरकर
ललकार है निर्भीक की।
चिंगारी लगी होगी कहीं॥
ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठकर
विरोध कर रहा डटकर
सहम गए ज़ालिम हुक्मरान।
चिंगारी लगी होगी कहीं॥
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अंश हूँ मैं . . .
- आँसू
- आत्माएँ भी मरती हैं . . .
- उजाले में अँधेरा . . .
- उड़ान भरना चाहता हूँ
- ए लहर! लहर तू रहती है
- एक बेज़ुबां बच्ची
- एकलव्य कविता-1
- एकलव्य कविता-2
- कौन हूँ?
- गणतंत्र
- चिंगारी
- चुगली कहूँ
- जहुआ पेड़
- तज़ुर्बे का पुल
- दीवाना
- नज़रें
- पत्रकार हूँ परन्तु
- परिंदा कहेगा
- पहिया
- मरा बहुरूपिया हूँ...
- मैं पुतला हूँ...
- लौहपथगामिनी का आत्ममंथन
- विडम्बना
- विषरहित
- सड़क और राही
- हर गीत में
- ख़ुशियों भरा...
- ग़म एक गम है जो...
हास्य-व्यंग्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सामाजिक आलेख
नज़्म
लघुकथा
कविता - हाइकु
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं