ए लहर! लहर तू रहती है
काव्य साहित्य | कविता डॉ. ज़हीर अली सिद्दीक़ी15 Nov 2019
क्रूर भले कहता कोई
कर्म प्रधान तू रहती है
सागर के गहराई में भी
ए लहर! लहर तू रहती है।
अध्यात्म की उद्गम है तू
विद्रोह की हुंकार है
चेतना की आग़ोश में
श्रेष्ठता की प्रमाण है।
चट्टानों से टकराने पर
अक्सर लोग टूट जाते हैं
क्या अदा अनोखी है तेरी!
विकराल रूप धारण करती है।
साहिल देख ठहर जाती है
थमकर भी तू रम जाती है
वज़ह प्रेमियों के जोड़ों की
जगह सुखद तू बन जाती है।
भरती डगर जिस ओर तू
रुकती नहीं उस ओर तू
यदि हार भी उस जीत में
उस हार का आधार क्या?
चीख़ती चिंघाड़ती
बढ़ती रही बिन हारती
आराम का फ़रमान क्या
जब जीत का अरमान था।
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