दीवाना
काव्य साहित्य | कविता डॉ. ज़हीर अली सिद्दीक़ी15 Sep 2022 (अंक: 213, द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)
उस प्यार को प्यार नहीं कहते
जिसमें परित्याग नहीं होता
जो परित्यागों से लथपथ है
हर प्यार वहीं नतमस्तक है॥
जिस प्यार में स्वार्थ नहीं होता
उसमें ही प्यार निखरता है
जो प्यार का देखता स्तर है
उसका स्तर ही मिटता है॥
परवानों की बस्ती में
एक दीया प्यार का जलता है
जलते ही यदि बुझ जाता है
वह प्यार नहीं टिक पाता है॥
तकरार प्यार में होता है
पर प्यार कभी नहीं मरता है
तकरार से जो मरहूम हुआ
वह प्यार कभी नहीं होता है॥
मैं प्यार का वह दीवाना हूँ
अंतिम साँसों तक लड़ता हूँ
जब शमा जले तो जलता हूँ
बुझने पर जलकर मिटता हूँ॥
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अंश हूँ मैं . . .
- आँसू
- आत्माएँ भी मरती हैं . . .
- उजाले में अँधेरा . . .
- उड़ान भरना चाहता हूँ
- ए लहर! लहर तू रहती है
- एक बेज़ुबां बच्ची
- एकलव्य कविता-1
- एकलव्य कविता-2
- कौन हूँ?
- गणतंत्र
- चिंगारी
- चुगली कहूँ
- जहुआ पेड़
- तज़ुर्बे का पुल
- दीवाना
- नज़रें
- पत्रकार हूँ परन्तु
- परिंदा कहेगा
- पहिया
- मरा बहुरूपिया हूँ...
- मैं पुतला हूँ...
- लौहपथगामिनी का आत्ममंथन
- विडम्बना
- विषरहित
- सड़क और राही
- हर गीत में
- ख़ुशियों भरा...
- ग़म एक गम है जो...
हास्य-व्यंग्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
सामाजिक आलेख
नज़्म
लघुकथा
कविता - हाइकु
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं