अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

जो जीते वही सिकंदर

उस सुबह विधान सभा के चुनाव परिणाम आने थे। अभी सुबह की चाय पीकर दैनिक कार्यों से निवृत होने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा था कि मोबाइल घनघना उठा। स्क्रीन पर नज़र डाली तो पता चला चकोर जी हैं।

"हैलो, कहिए सुबह-सुबह कैसे याद किया? "

उधर से चकोर जी हँसते हुए बोले, "भाई साहब, कभी वर्तमान में भी रहा करो। आज आपको मेरे साथ तँवर साहब की कोठी पर मुबारकबाद देने चलना है। मैं आपकी सोसाइटी के गेट पर साढ़े दस बजे आऊँगा। तैयार रहिये।"

मैंने घड़ी देखी तो आठ बज रहे थे। ख़ैर, तँवर साहब इस चुनाव में हमारे विधान सभा क्षेत्र से एक राजनैतिक दल के उम्मीदवार थे और चकोर जी अक्सर छोटे-बड़े कामों के लिए उनसे मिलते रहते थे। साढ़े दस बजे सोसाइटी के गेट पर पहुँचा तो देखा कि चकोर जी स्कूटर खड़ा करके सड़क के उस पार के खोके पर सिगरेट के कश खींच रहे हैं। मैंने सड़क पार की और उनके पास जा पहुँचा।

खोके वाले के रेडियो ट्रांजिस्टर पर चुनाव परिणाम आ रहे थे और चकोर जी का सारा ध्यान उधर केंद्रित था। कोई दस मिनट में मालूम हो गया कि तँवर साहब निर्दलीय प्रत्याशी कँवर साहब से काफ़ी पीछे चल रहे हैं और उनका जीतना नामुमकिन है। यह पक्का होने पर चकोर साहब मुझसे मुस्कराते हुए बोले, "चलो, कँवर साहब को ही मुबारकवाद देने चलते हैं। हमें क्या? तँवर हों या कुँवर, हमारे लिए तो जो जीते वही सिकंदर!"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं