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होइहि सोइ जो राम रचि राखा! 

एक बार विष्णु लोक से क्रौंच पक्षियों का एक जोड़ा मृत्यु लोक में आया। ‘क्रौंच कथा’ को सुनाने वाले पंडित जी का कहना था कि क्रौंच पक्षियों को वह जोड़ा तभी उड़ सकता था जब नर का बायाँ पंख मादा के दाएँ से जुड़ा हो। मृत्यु लोक में आकर वह जोड़ा एक वृक्ष की समीप की दो टहनियों पर बैठा। यूँ तो वे टहनियाँ एक दूसरे के समानांतर दिख रही थीं, लेकिन वे ऐसी उस पेड़ पर लिपटी किसी बेल के कारण थीं। पक्षियों के उन पर बैठने की वजह से वह लिपटी बेल टूट गई और वे दोनों टहनियाँ छिटककर ऊपर नीचे हो गईं। 

फलस्वरूप, उस क्रौंच के नर और मादा के जुड़े पंख भी एक दूसरे से अलग हो गए। अब मादा निचली टहनी पर थी और नर ऊपरी टहनी में। इस अवस्था में उनका उड़ना नामुमकिन था। तभी उन्हें एक बहेलिया उस वृक्ष की तरफ़ आते दिखाई दिया। मादा ने नर से कहा, “यह बहेलिया हमें देख रहा है। अब यह हमें मारेगा।” 

यह सुनकर नर बोला, “होइहि सोइ जो राम रचि राखा।” 

तभी उस बहेलिये ने अपने धनुष से उस क्रौंच के जोड़े को मारने के लिए तीर छोड़ा। वह तीर निचली वाली टहनी पर लगा तो वह ऊपर उठी और ऊपर वाली टहनी के समानांतर हो गई। ऐसा होते ही उनके अलग हुए पंख जुड़ गए और वे तुरंत ही उड़कर विष्णु लोक के लिए प्रस्थान कर गए (को करि तर्क बढ़ावै साखा)! 

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