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सीख देता प्रसंग 

 

सत्रह दिसंबर 2025 के दिन मुझे सपत्नीक सैन डिएगो से अलास्का एयरलाइन से सान होजे आना था। मैंने अपनी आदत के अनुसार अपना तीन पीस का सूट पहना और बैग में मौजूद डॉलर्स से दो सौ बीस डॉलर अपने पास रख लिए। इनमें से बीस डॉलर का नोट मैंने अपने कोट की अंदरूनी जेब में और सौ सौ डॉलर के दो नोट अपने वेस्टकोट की जेब में रखे। 

हमारी यह फ़्लाइट अलास्का की उड़ान संख्या 2491 से थी और इसका समय सुबह 10:22 बजे था। हम लोग सैन डिएगो अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर सुबह 8 बजे पहुँच गए थे। सुरक्षा जाँच के समय मैंने अपना बैग, कोट, वेस्टकोट, बेल्ट, मोबाइल इत्यादि ट्रे में रखे। सुरक्षा जाँच के बाद मैंने दूसरी तरफ़ पहुँची ट्रे से अपना कोट और वेस्टकोट पहने और फिर बेल्ट लगाकर और अपना बैग उठाकर मैं पत्नी के साथ गेट नंबर 22 की तरफ़ चल दिया। 

बोर्डिंग पास पर यही गेट अंकित था लेकिन जब हम गेट नंबर 22 पर पहुँचे तो कुछ देर बाद पता चला कि अब हमें अपनी फ़्लाइट गेट नंबर 35 से पकड़नी है। यह ख़बर मिलते ही हम दोनों यानी सुरेंद्रा जी और मैं गेट नंबर 35 की तरफ़ चल दिए। 

गेट नंबर 35 पर पहुँचने के बाद मैंने उस गेट के प्रवेश द्वार पर मौजूद एयरलाइन के निरीक्षक से अपना बोर्डिंग पास दिखाते हुए पूछा, “इज़ दिस फ़्लाइट फ़्रॉम हेअर नाउ? (क्या यह फ़्लाइट अब यहाँ से है?)” तो जवाब में उसने मेरे बोर्डिंग पास पर लगे सर्कल की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “हैव यू नॉट सीन दिस?(क्या आपने यह नहीं देखा?)” 

इतना सुनते ही मैंने उससे कहा, “कैन यू प्लीज़ चेक इट नाउ? (कृपा करके क्या इसे आप चैक कर सकती हैं?)” मेरी राय का सम्मान करते हुए उसने तुरंत अपने टैबलेट पर चेक करने के बाद कहा, “यस, इट इज़ फ़्रॉम हेअर नाउ। (हाँ, अब यह यहीं से है।)”

अब हम दोनों गेट 35 के प्रतीक्षालय में बैठकर अपनी उड़ान का इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद पता चला कि अब हमें अपने वायुयान में गेट नंबर 32 से प्रवेश करना होगा और अब हमारी इस उड़ान का समय 12: 29 बजे है। 

जैसे ही हम गेट नंबर 32 पर पहुँचे तो पता चला कि अब हमें गेट नंबर 31 से अपने वायुयान में प्रवेश करना होगा। 

गेट 31 पर बैठ कर हम समय बिता रहे थे कि तभी मुझे भूख महसूस हुई और मैं पास के उस स्टॉल पर पहुँचा जहाँ लोग खाने-पीने का सामान ख़रीद रहे थे। मैंने लगभग छह डॉलर में चार शाकाहारी रोल ख़रीदे और अपने बीस डॉलर के नोट को देकर इस राशि का पेमेंट किया। 

लगभग सुबह साढ़े ग्यारह बजे थे जब मुझे ख़्याल आया कि मैं शेष बचे चौदह डॉलर मूल्य के नोटों को अपने सौ सौ डॉलर के दो नोटों के साथ रख दूँ। 

मैंने अपने वे दो नोट तलाशे तो वे मुझे अपने कोट, पैंट या वेस्टकोट की जेबों में कहीं नहीं मिले। मुझे लगा कि जब मैंने उस स्टॉल पर पेमेंट के लिए बीस डॉलर का नोट अपनी जेब से निकाला था, उस वक़्त वे वहाँ गिर गए होंगे। मैं पत्नी के साथ उस स्टॉल पर गया लेकिन वहाँ से भी मुझे निराश होकर लौटना पड़ा। 

दोपहर का समय यानी दिन के बारह बज चुके थे और हमारी फ़्लाइट का पायलट मेरे से कुछ दूरी पर खड़ा था। पत्नी मेरे चेहरे की परेशानी से समझ गई थी कि मैं कुछ डॉलर खो चुका हूँ। लेकिन मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि मैं सौ सौ डॉलर के दो नोट खो चुका हूँ। 

अब हम वायुयान में दाख़िल होने का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी मेरा दायाँ हाथ अपने वेस्टकोट के ऊपरी दाएँ हिस्से पर लगा तो ऐसा लगा कि उधर कुछ है। मैंने उधर देखा तो मुझे यह देख ताज्जुब हुआ कि मैंने सुरक्षा जाँच से बाहर आने के बाद जल्दी में ट्रे से उठाई वेस्टकोट को उल्टा पहन लिया था। फलस्वरूप, जिस जेब मैंने वे सौ डॉलर के दो नोट रखे थे, वह मेरे लिए अदृश्य हो चुका था। तत्काल ही मैंने अपना कोट उतार कर पत्नी को पकड़ाया और वेस्टकोट को सीधा करके पहना। मेरे दो नोट उसकी दायीं जेब में सही सलामत थे। स्वाभाविक था कि मैं बहुत ख़ुश हुआ और पत्नी ख़ुश होते हुए मुझसे बोली, “मैं हमेशा कहती हूँ कि आप जल्दीबाज़ी मत किया करो लेकिन आप मेरी सुनते कब हैं?” 

वायुयान में दाख़िल होने का सिलसिला हमारे से ही शुरू हुआ क्योंकि हमारी सीट संख्या 1C और 1D थी। 

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