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कैसे आ गई है 

वो  लड़की घर पे  कैसे आ गई है
शिकन बिस्तर पे  कैसे आ गई है
 
कभी जो प्यार ही बस चाहती थी
वो  अब ज़ेवर पे  कैसे आ गई है
 
ज़रा सी बात  हो जाती है घर में
ये तू   खंजर पे  कैसे आ गई है
 
यहाँ हर बूँद इससे है      परेशां
नदी   पत्थर पे  कैसे आ गई है
 
मोहब्बत मिट गई दुनिया से आख़िर
सियासत सर पे  कैसे आ गई है
 
मुझे  बदनाम   करने पर तुली है
वो  फिर छप्पर पे  कैसे आ गई है
 
ग़ज़ल पनघट पे शरमाती थी कल तक
वो अब शावर  पे  कैसे   आ गई है  

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