अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सतयुगी सपना

घटना सच्ची है लेकिन स्थान और पात्रों के नाम मैंने बदल दिए हैं। दरअसल, पिछले एक साल से मैं उत्तम नगर में सुखराम जी के पड़ोस में रहता हूँ। दिल्ली के उत्तम नगर की संकरी गलियों में बने सभी मकान एक दूसरे से चिपके हुए हैं। फलस्वरूप, न चाहते हुए भी आपस में परिचय हो जाता है। ख़ैर, पहले आपको सुखराम जी के बारे में बता दूँ। उनकी उम्र यही कोई पचास के आसपास है और परिवार के नाम पर उनकी पास पत्नी के अलावा एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। सुखराम जी की परचून की दुकान है। बहरहाल, सुखराम जी के अलावा आपका परिचय गज्जू से भी करवाना ज़रूरी है। गज्जू के बाप का मकान तो अगली गली में है लेकिन अभी एक सप्ताह पहले तक उसका सारा समय हमारी गली में गुज़रता था। वज़ह इतनी ही थी कि वह पिछले छह महीनों के दौरान सुखराम जी के परिवार के साथ ऐसे घुल मिल चुका था जैसे पानी में नमक। एक-दो बार मैंने जब सुखराम जी का ध्यान इस और खींचा तो वे बोले, "इस कलयुग में गज्जू

जैसा लड़का भी होगा, मैंने कभी सोचा न था। हमारे छोटे-मोटे सभी काम ऐसे करता है जैसे आजकल कोई अपना सगा भी नहीं करता है।"

बहरहाल, यही कोई छह दिन पहले सुखराम जी की सत्रह वर्षीया बेटी गोपा जब स्कूल से घर नहीं लौटी तो सुखराम जी ने मदद के लिए गज्जू को खोजा। पता चला कि आज गज्जू भी सुबह से घर नहीं लौटा है। उसी दिन देर शाम किसी जान-पहचान वाले ने सुखराम जी को सूचना दी कि उसने गोपा और गज्जू को दोपहर से कुछ पहले आनंद विहार बस अड्डा जाने वाली बस में चढ़ते देखा था। छह दिन बीत चुके हैं लेकिन पुलिस अभी गज्जू और गोपा तक नहीं पहुँच पाई है। सुखराम जी को असली सदमा इस बात का है कि वे कलयुग में रहते हुए भी सतयुगी सपना देखते रहे।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं