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अमावस का अँधेरा

 

 

परिस्थितियाँ कुछ ऐसी थीं कि सुरेश और सुनीता की पीठ मेरी ओर थी। मेरे अचानक आने से वे अनजान थे। मैं ख़ुद को लगभग घसीटता हुआ ड्राइंगरूम तक ले गया और सोफ़े पर ढह-सा गया। दिमाग़ में तरह-तरह के सवाल मचलने लगे। हालत ऐसी थी कि जैसे काटो तो ख़ून न निकले।

“नहीं, नहीं, यह ठीक नहीं है,” सुनीता की आवाज़ सुनकर मेरा ध्यान टूटा। नज़र उठाई तो स्तब्ध रह गया। सुरेश सुनीता को चूमने की कोशिश कर रहा था और सुनीता उसे रोकते हुए अलग खड़ी हो गई थी।

मैं सन्न रह गया। जिस सुरेश पर मैंने इतना विश्वास किया, वह ऐसा करेगा, यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।

“अरे, आप कब आए?” सुनीता ने पूछा।

मैंने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा, “अभी आया हूँ। तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए ऑफ़िस से जल्दी आ गया।”

“आवाज़ दे देते तो . . . सुरेश आया था, इसलिए मैं लॉन में थी,” वह पास आकर बैठ गई।

मेरे मन में एक क्षण को क्रोध की ज्वाला उठी। अभी थोड़ी देर पहले जो दृश्य देखा था, वह आँखों के सामने घूम रहा था। पर मैंने ख़ुद को रोक लिया। जल्दबाज़ी से बात बिगड़ सकती थी।

रात भारी तनाव में कटी। सुनीता गहरी नींद में थी, पर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी। मन में प्रश्नों का तूफ़ान था, यह सब कैसे हुआ?

क़रीब चार साल पहले मैं इस महानगर में आया था। पिता चाहते थे कि मैं आईएएस बनूँ, पर मेरा झुकाव पत्रकारिता की ओर था। मैंने मुंबई की एक प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्था में प्रवेश लिया। पढ़ाई में अव्वल रहा और जल्द ही एक प्रकाशन संस्था में उपसंपादक की नौकरी मिल गई।

इसी बीच मेरा विवाह सुनीता से हो गया। वह सुंदर, सरल और स्नेही थी। शुरूआत के दिन बेहद सुखद थे, पर धीरे-धीरे मैं अपने कैरियर और लेखन में इतना डूब गया कि घर-परिवार से दूरी बढ़ती गई। मैं पैसे देकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझने लगा।

दो साल बीत गए, पर हमारे घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी। सुनीता कभी-कभी इशारों में अपनी इच्छा जताती, पर मेरे पास समय कहाँ था?

फिर अचानक प्रकाशन संस्था बंद हो गई और मैं बेरोज़गार हो गया। इस आघात ने मुझे तोड़ दिया। बीमारी ने भी घेर लिया। उन दिनों सुरेश का हमारे घर आना-जाना शुरू हुआ। वह पड़ोस में रहता था। मेरी बीमारी में उसने बहुत मदद की। सुनीता उसे भाई कहती और वह मुझे भैया।

कुछ महीनों बाद मुझे नई नौकरी मिल गई और मैं फिर काम में डूब गया। सुरेश का आना-जाना जारी रहा। मैंने कभी शक नहीं किया, आज तक।

उस दिन का दृश्य मेरे मन में तूफ़ान मचा रहा था। पर गहराई से सोचने पर मुझे अपनी ग़लती समझ आई। क्या दोष सिर्फ़ सुरेश या सुनीता का था? या मैं ही अपनी पत्नी से दूर होता गया?

मैंने निश्चय किया कि अब सब बदलूँगा। ऑफ़िस से समय पर घर आऊँगा, सुनीता को समय दूँगा, उसका प्यार और अधिकार लौटाऊँगा।

उस रात मैंने सुनीता को प्यार से चूम लिया। कई दिनों बाद हम सचमुच एक-दूसरे में खो गए। जैसे हमारे जीवन में फिर से वसंत लौट आया।

अब हमारी दिनचर्या बदल गई। साथ फ़िल्में, साथ घूमना, हँसी-मज़ाक। सुरेश आया तो मैंने ठंडे स्वर में कहा, “जरूरत होगी तो बुला लेंगे,” धीरे-धीरे उसका आना बंद हो गया।

तीन महीने बीत गए। एक दिन डॉक्टर ने बताया कि सुनीता गर्भवती है। हमारी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

एक रविवार को हम अपने संसार में खोए थे कि डोरबेल बजी। दरवाज़े पर सुरेश था। सुनीता ने कठोर स्वर में कहा, “क्या है? यहाँ क्यों आए हो?” और दरवाज़ा बंद कर दिया।

वह लौटकर बोली, “मूड ख़राब कर दिया इसने। समझता नहीं कि हम पति-पत्नी हैं।”

मैंने उसे बाँहों में भर लिया। मन में विश्वास जागा कि हमारे जीवन पर लगा ग्रहण अब हट चुका है। अमावस का अँधेरा छँट गया है और अब हमारे जीवन में सिर्फ़ पूर्णिमा की चाँदनी रहेगी।

मैंने ठान लिया कि अब इस चांद्र पर कभी ग्रहण नहीं लगने दूँगा। 

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