बुनियादी मानवीय मूल्यों से समाज का प्रबोधन करने वाले कबीर
आलेख | साहित्यिक आलेख स्नेहा सिंह1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जैसे-जैसे आर्थिक विकास के साथ प्रतिस्पर्धी समाज और अर्थकारण आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे मानव सम्बन्ध, जो स्वाभाविक रूप से समरूप और सहयोगात्मक होने चाहिएँ थे, उनमें प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव आता जा रहा है। पति-पत्नी, भाई-भाई, सहकर्मी परस्पर सहयोग के बजाय एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते जा रहे हैं। इसके कारण सामाजिक सम्बन्धों में एक प्रकार का तनाव पैदा होता जा रहा है। इससे धीरे-धीरे हताशा, आत्महत्या, विवाह-विच्छेद (तलाक़) और कृत्रिम जीवनशैली की अनेक सामाजिक तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। स्वस्थ और समरूप समाज का जीवन लुप्त होता जा रहा है। सामाजिक ताना-बाना बिखरता जा रहा है। ऐसे समय में हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हम दूसरों पर आधिपत्य (अधिकार) जमाने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे की मदद करके सहजीवन जीने के लिए पैदा हुए हैं। यह बात हमें कबीर याद दिलाते हैं।
मध्य युग में हुए कबीर, आम लोगों के बीच के एक साधारण साधु थे। उन्होंने गृहस्थ रहकर जीवनयापन किया था। उन्होंने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की थी। हाँ, यह अलग बात है कि उनकी मृत्यु के बाद कबीर पंथ की स्थापना हुई। लेकिन कबीर तो स्वयं एक प्रबोधक (जगाने वाले) थे। मध्य युग में समय की माँग के अनुसार उन्होंने जो मूल्य प्रबोधन किया, उसे मुख्य रूप से देखना चाहिए।
कबीर मनुष्य का कैसा निर्माण करना चाहते थे? उन्हें एक ‘सज्जन’ आदमी की तलाश थी। दूसरों की भलाई करने वाला ही सच्चा सज्जन है। ऐसे समय में कई संप्रदाय खड़े हो गए थे। गुजराती साहित्य में धर्म और संप्रदाय की बात आते ही हमें नरसी मेहता से लेकर अलग-अलग संप्रदाय दिखाई देते हैं। यह बात मात्र हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं थी। मुस्लिम धर्म में भी अनेक पीर, औलिया और मुझावर (मुजावर) ने अपनी अलग-अलग चौकियाँ बना ली थीं, तो बुद्ध और जैन धर्म भी अनेक शाखाओं में विभाजित हो गए थे। उस समय कबीर ने बिना किसी संप्रदाय के विशेष उपदेश दिए। उन्होंने निराकार और निर्गुण ईश्वर को माना। सत्य ही ईश्वर माना। उन्होंने कहा हैं, “सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप, जाके हिरदय सांच हैं, ताके हिरदय आप।” यहाँ ‘आप’ का अर्थ ईश्वर हैं। संप्रदाय मुक्त, नीतिवान और परस्पर प्रेम तथा आदर से युक्त जीवन ही कबीर के अनुसार धर्म था।
जीवन में ऐसे सज्जन मनुष्य को कितनी भौतिक चीज़ों की आवश्यकता होती हैं? कबीर कहते हैं:
“सांई इतना दीजिए जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु भूखा न जाय।”
यानी मेरे परिवार की ज़रूरतें पूरी हो जाएँ और दूसरों का विचार भी मैं कर सकूँ, ऐसा कबीर कहते हैं। कबीर के अनुसार सच्चा धार्मिक व्यक्ति ही सज्जन होता है। कबीर कहते हैं कि ऐसा सज्जन व्यक्ति या साधु कैसा होना चाहिए?
“दया, ग़रीबी, बंदगी, समता, शील स्वभाव,
इतने लक्षण साधु के, कहत कबीर समझाय।”
उनके दोहों में जहाँ-जहाँ “कहत कबीर सुनो भाई साधो” आता है, वह सज्जनों के लिए ही कहा गया है। ऐसे सज्जनों को क्या करना चाहिए?
“कबीर कहैं कमाल कूं, दो बाता सीख ले,
कर साहब की बंदगी और भूखे को अन्न दे।”
लोगों को दुख क्यों होता है?
“दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय?”
जो आपके जैसा ही है, उसके प्रति यदि आपके मन में दया और करुणा होगी, तो सम्बन्धों में तनाव पैदा नहीं होगा। आज तनाव इसलिए है, क्योंकि हमें सब कुछ अकेले ही चाहिए, हमारे प्रतिद्वंद्वी या पड़ोसी को न मिले, ऐसी हमारी इच्छा होती है। इसी से वर्चस्व अथवा आधिपत्य की भावना पैदा होती है। यह वर्चस्व की भावना ही एक मानसिक अस्वस्थता है, इसे छोड़ना हो तो कबीर के अनुसार मनुष्य को पहले एक ‘मानव’ बनना होगा और दूसरों के प्रति दया रखनी होगी।
कबीर की वाणी आज भी समाज में शीतलता फैलाती है। कबीर कहते हैं:
“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय,
औरन को शीतल करे,आपहु शीतल होय।”
इसका अर्थ यह हैं कि मन का अहंकार छोड़े बिना आपके व्यक्तित्व की शीतलता नहीं फैल सकती। आधुनिक समय में हमें यह बात विशेष रूप से समझनी होगी। हम कहते हैं, “मुझे पहचानते हो, मैं कौन हूँ?” हमें थोड़ी सी सुविधा मिलते ही हम ख़ुद को महान मानने लगते हैं, इतना ही नहीं, दूसरों को तुच्छ समझने लगते हैं। इस आधिपत्य की भावना को छोड़कर व्यक्तित्व में शीतलता लाना बहुत ज़रूरी है।
कबीर के अनुसार यदि मनुष्य ऐसा सज्जन हो, तो कबीर के अनुसार धर्म क्या है? कबीर के मन में ईश्वर हमारी ऊपर विराजमान रहने वाली कोई सत्ता नहीं है। कबीर कहते हैं:
“जहाँ दया तहाँ धर्म हैं, जहाँ लोभ वहाँ पाप,
जहाँ क्रोध वहाँ काल हैं, जहाँ क्षमा वहाँ आप।”
ईश्वर मनुष्य के बाहर नहीं हैं। जो माफ़ी माँगता हैं और माफ़ी देता है, वही ईश्वर है, ऐसा कबीर कहते हैं। ईश्वर का कोई अलग अस्तित्व नहीं है, यह बात कबीर समझाते हुए कहते हैं:
“साहब तेरी साहेबी, सब घट रही समाय,
ज्यों मेहँदी के पान में लाली रही छुपाय।”
अर्थात् ईश्वर इस सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है, ऐसा कबीर मानते हैं। इसलिए वे मंदिरों में मूर्ति पूजा के पक्ष में नहीं थे। कबीर कहते हैं:
“पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार,
या ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।”
इस पर से मुझे एक प्रसिद्ध भजन याद आता है: “हे जी रे मनसा, मालणी हो जी, गोरष जागतो नर सेवीए तने मळे निरंजन देव जी” (यानी मुझे याद आता हैं कि गाँधी जी भी सत्य को ही ईश्वर मानते थे और मंदिरों में दर्शन के लिए नहीं जाते थे)। धर्म के नाम पर बाहरी आडंबर के कबीर विरोधी थे। वे कहते थे:
“न्हाए धोएँ क्या भया, जो मन मेल न जाय,
मीन सदा जल में रहे, धोएँ बाँस न जाय।”
बाहरी आडंबर हमें ख़ुद को बड़ा दिखाने के काम आता है, उससे लोगों का कोई भला नहीं होता। कबीर के मन में धर्म यानी केवल मानव प्रेम, मानव का तिरस्कार नहीं। बाहरी आडंबर का विरोध करते हुए कबीर आगे कहते हैं:
“मस्जिद से कुक बाग पुकारे, तेरा ख़ुद क्या बहरा है?
चींटी के भी पर हिलते हैं वो भी तो ख़ुदा सुनता है।”
चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम:
“माला फेरत जुग भया, गया न मन का मेल,
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर।”
सच्चा धर्म कर्मकांडों में या शास्त्रों में नहीं, बल्कि मानव प्रेम में है, यह बात कबीर कहते हैं:
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।”
धर्म के नाम पर हमारी संपत्ति या धन ही हमारे सिर पर चढ़ गया है, उस विषय में कबीर कहते हैं:
“जग सारा दरिद्र भया, धनवंत भया न कोय,
धनवंत सोहि जानीए, राम पदारथ होय।”
कबीर ने जाति-पांति के भेदभाव का विरोध किया था। वास्तव में ऐसे भेदभावों से कबीर का मन भर आया था। उन्होंने कहा है;
“रहना नहीं, देश बिराना है,
ये दुनियाँ काग़ज़ की पुड़िया,
बूँद पड़े घुल जाना है,
यह संसार झाड़ और झांखर,
आग लगे बरी जाना है।”
जाति-पांति का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था;
“जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”
कबीर को मन से मानने वाले लोग बहुत कम थे। वे कहते हैं;
“कबीर खड़ा बाज़ार में माँगे सबकी ख़ैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।”
परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या कही?
“जाती पांती सब झूठ है, भरम पाड़ो मत कोय,
जाती नहीं जगदीश की, औरन की क्या होय?”
कबीर स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि जन्म से कोई ऊँचा या नीचा नहीं होता।
“एक बूँद एकै मल मूतू, एक ही चाम एक ही गूदा
एक ही ज्योति से सब उतपन्ना, कौन बाम्हन, कौन सूदा?”
इस प्रकार, कबीर सच्चे धर्म के लिए गुरु को बहुत महत्त्व देते थे। गुरु के विषय में कबीर का दोहा जगप्रसिद्ध है;
“गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय?
बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताय।”
गुरु की महिमा गाते हुए कबीर कहते हैं:
“सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय,
सात समंदर की मसी करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।”
कबीर के अनुसार गुरु की महिमा का अर्थ आज की शिक्षा या ट्यूशन नहीं है। उस समय स्कूल नहीं होते थे, परन्तु गुरु के पास से सही मूल्य मिलते थे। इसलिए गुरु की खोज महत्त्वपूर्ण थी। आज के सूचना युग में भी सच्चे गुरु या मार्गदर्शक को खोजना उतना ही कठिन हैं। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि कबीर एक तरफ़ जहाँ संशय पैदा करते हैं, वह संशय मूर्तिपूजा के विषय में है। परन्तु सच्चा ज्ञान पोथियों बाँचने से नहीं मिलेगा, सच्चा गुरु मिलेगा तभी सच्चा ज्ञान मिलेगा, यह बात कबीर उदाहरण देकर कहते हैं। इतना ही नहीं, वे ज्ञान का बोझ नहीं, बल्कि विनम्रता की बात करते हैं। यहाँ आधुनिकता की बात आती हैं। हम कुछ भी न जानने के बावजूद, एक अच्छी कार या एक अच्छी सरकारी नौकरी पाकर घमंड में आ जाते हैं। फिर हम सोचने लगते हैं कि हम ही समझदार हैं और बाक़ी लोग पीछे रह गए हैं या कम अक़्ल के हैं। यह हमारा अंधा अहंकार हैं। इस अहंकार का अंत ही परिणाम है। मैं ही सब कुछ जानता हूँ, मैं ही उपभोग कर रहा हूँ, मैं बहुत शक्तिशाली हूँ, ऐसी मानसिकता हमें आसमान में उड़ाने लगती है। यहाँ विनम्रता की आवश्यकता है। हमारे आधिपत्य या वर्चस्व के हिस्से के रूप में हम किसी संप्रदाय या जाति समूह का गौरव रखते हैं। वास्तव में यह पहचान हमें और अधिक बाँटने वाली (विभाजित करने वाली) होती है।
एक बार एक व्यक्ति की लॉटरी लग गई और वह करोड़पति बन गया। एक पत्रकार ने उससे पूँछा, “आपको यह जैकपॉट कैसे लगा?”
उसने कहा, “मेरी बुद्धि, मेरी मेरिट।”
पत्रकार ने विवरण माँगा।
उसने कहा, “देखो, मेरी जन्म तारीख़ के शुरूआती दो अंक लॉटरी टिकट के पहले दो अंक बने। फिर मेरी पत्नी की जन्म तारीख़ के दो अंक उसके बाद के अंक बने। मेरी बेटी की जन्म तारीख़ के अंक उसके बाद के अंक बने और इस तरह टिकट के सारे अंक मिल गए। इस प्रकार हिसाब लगाने से मुझे जैकपॉट मिला।”
पत्रकार ने पूछा, “परन्तु तुम्हारी बेटी की जन्म तारीख़ और लॉटरी के अंतिम अंक में तो दो अंकों का अंतर पड़ रहा है।”
तब लॉटरी जीतने वाले ने गर्व से कहा, “लॉटरी तो मुझे लगी है ना? तो भाई आपका इतना ज्ञान किस काम का।”
हम भी आज इसी प्रकार के हैं कि संसार में लॉटरी लग गई है, इसलिए अपने आपको अधिक गुणवान, अधिक संस्कारी, अधिक कुलीन साबित करने की कोशिश करते हैं। पर ऐसा साबित नहीं होता। हमें विनम्र रहना चाहिए और अहंकार नहीं करना चाहिए, कबीर हमें यही सिखाते हैं। अंत में इन तीन दोहों को देखकर हमें विनम्र बनने का प्रयास करना चाहिए।
“माटी कहे कुम्हार को, तू क्या रुँधे मोय,
एक दिन ऐसा होयगा मैं रूँधूगी तोय।”
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।”
“बुरा देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
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