अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मुझे मंज़ूर हैं

 

अहमदाबाद के प्रसिद्ध एल.डी. आर्ट्स कॉलेज में नया सत्र शुरू हो चुका था। एक ओर नए-नए कॉलेज में आए उत्साहित युवाओं के समूह मधुमक्खियों की तरह पूरे परिसर में घूम रहे थे, तो दूसरी ओर पुराने छात्र भी इधर-उधर मँडरा रहे थे। अभी बरसात की शुरूआत नहीं हुई थी, फिर भी युवावस्था की मादकता पूरे कैंपस में फैली हुई दिखाई देती थी। धूप के बीच भी स्नेह और वासना के तराज़ू पर तौला जाता प्रेम चारों ओर घूम रहा था।

लगभग ग्यारह बजे घंटी बजी। अधिकांश विद्यार्थी अपने-अपने कक्षाओं में चले गए। कुछ कैंटीन की ओर बढ़े तो कुछ पुस्तकालय की ओर। देखते ही देखते परिसर लगभग ख़ाली हो गया। कुछ वरिष्ठ छात्र अपने बेरोज़गार सुपर-सीनियरों और स्वयंभू छात्र नेताओं के साथ कैंटीन की बेंचों पर बैठकर क्रांति की बातें कर रहे थे। घर में पर्दे तक नहीं बदलते थे, चादरें नहीं बदलती थीं, लेकिन यहाँ बैठकर वे देश बदलने की योजनाएँ बना रहे थे।

इसी प्रकार की क्रांतिकारी चर्चाओं के बीच एक चमचमाती काली रेंज रोवर कार आकर रुकी। सबका ध्यान उधर चला गया। कार से एक सुंदर युवती उतरी। उसने चारों ओर देखा, कैंटीन के पास बैठी कुछ युवतियों की ओर हाथ हिलाया और उनकी तरफ़ बढ़ने लगी।

“अरे, विभा पटेल पंड्या ख़ुद? आज सूरज किस दिशा से निकला कि इन्हें इस ग़रीबख़ाने में फिर से आना पड़ा?” एक सीनियर लड़के ने टिप्पणी की तो सब हँस पड़े।

“शायद लाइब्रेरी देखने आई होगी। पुराने क़िस्से, पुरानी भावनाएँ और पुराने कांड याद करने, वरना अब यह यहाँ आ कर करेंगी भी क्या?” दूसरा लड़का बोला।

“मैडम के प्रेम के कारण ही तो पटेल को नौकरी छोड़नी पड़ी थी। किताबों के लेनदेन में कब प्रेमपत्रों का लेनदेन शुरू हो गया, पता ही नहीं चला। कॉलेज ने दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। निश्चित ही किसी से मिलने या किसी की सिफ़ारिश के लिए आई होगी,” एक लड़की बोली।

“विभा अपनी पढ़ाई पूरी करने आई है। तुम लोगों को बेकार की बातें करने की ज़रूरत नहीं है। और हाँ, पटेल का तो पता नहीं, लेकिन वर्तमान प्रिंसिपल मैडम विभा की मौसी हैं। इसलिए ज़रा सँभल कर रहना,” नमिता ने कहा तो सब की हँसी बंद हो गई।

“चल विभु, इन लोगों के पास बैठने की कोई ज़रूरत नहीं है। वैसे भी बारह बजे हमारी क्लास शुरू हो जाएगी। चल, कक्षा में चलते हैं। ये लोग बेवजह मूड ख़राब करेंगे,” किन्नरी ने कहा।

चारों सहेलियाँ उठ कर चली गईं। वह समूह सिर झुका कर बैठा रहा।

कॉलेज भवन में प्रवेश करते समय विभा कुछ परिचित लोगों से मिली और कुछ नए चेहरे भी उसने देखे। लगभग चार साल बाद वह कॉलेज लौटी थी। पुस्तकालय के पास पहुँच कर वह कुछ क्षण रुक गई। अंदर झाँका और पूरी ज़िन्दगी उसकी आँखों के सामने घूम गई।

तब वह सेकंड ईयर में पढ़ती थी और लाइब्रेरियन केवल पटेल से प्रेम करने लगी थी। छह महीने तक प्रेम चला और फिर उसके पिता को इसकी ख़बर लग गई।

विभा के पिता ने अपने प्रभाव का उपयोग कर के केवल को नौकरी से निकलवा दिया। विभा की पढ़ाई भी रुकवा दी गई। लेकिन युवावस्था का प्रेम कहाँ मानने वाला था। दोनों ने विद्रोह कर दिया और भाग कर विवाह कर लिया।

पाँच साल पहले गाँव से नौकरी की तलाश में शहर आए केवल के पास रहने के लिए एक छोटा-सा घर था। वह एक वन-बीएचके मकान में किराए पर रहता था।

दोनों का गृहस्थ जीवन शुरू हो गया और सुखपूर्वक चलने लगा। कुछ प्रयासों के बाद केवल को शहर के एक विद्यालय में लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई। धीरे-धीरे जीवन आगे बढ़ रहा था। विभा के लिए परिस्थितियों में ढलना थोड़ा कठिन था।

वह एक धनी पिता की इकलौती बेटी थी। बहुत लाड़-प्यार में पली-बढ़ी थी। उसने जीवन में कभी अभाव नहीं देखा था और न ही कुछ सहा था। अब अचानक उसे सब कुछ करना पड़ रहा था। फिर भी उसने धीरे-धीरे जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश की। कठिनाइयाँ बहुत थीं, लेकिन अब लौट कर जाने का कोई रास्ता नहीं था।

विवाह को लगभग एक साल हुआ था कि केवल की माँ और बहन गाँव से शहर आ गए। उसकी माँ को टीबी थी और बहन के लिए वर ढूँढ़ना था।

विभा के लिए यह ज़िम्मेदारी पहाड़ टूट पड़ने जैसी थी। जिस विशाल बँगले में हर व्यक्ति का अपना अलग कमरा था, वहाँ से आकर अब उसे एक छोटे से घर में चार लोगों के साथ रहना पड़ रहा था।

शुरू में उसने प्रयास किया, लेकिन वह सब सहन नहीं कर सकी। एक ही बाथरूम, एक ही शौचालय और कहीं भी निजी जीवन का कोई स्थान नहीं। धीरे-धीरे झगड़े शुरू हो गए।

विभा बारबार केवल पर दबाव डालती कि वह अपनी माँ और बहन को गाँव वापस भेज दे। पैसे भेजता रहे, लेकिन उन्हें यहाँ न रखे।

अब दोनों के बीच लगातार मतभेद रहने लगे। अक्सर झगड़े होते। कई बार विभा टिफ़िन भी नहीं बनाती और खाना भी नहीं पकाती। केवल की माँ सब समझती थीं, लेकिन बीमारी के कारण कुछ कर नहीं पाती थीं। उसकी बहन यथासंभव घर के काम करती, फिर भी विभा को संतोष नहीं था।

एक दिन विभा के घर उसकी मौसी के बेटे की शादी का निमंत्रण आया। ज़िद करके वह शादी में चली गई। केवल बेबस हो कर उसे देखता रह गया।

वह गई तो फिर वापस नहीं लौटी।

पंद्रह दिनों तक उसका कोई समाचार नहीं मिला। उसके बाद केवल के घर एक लिफ़ाफ़ा आया, जिसमें तलाक़ का नोटिस था।

केवल सब समझ गया। उसने नोटिस स्वीकार कर लिया। अदालत के चक्कर शुरू हो गए और विभा फिर अपने अमीर पिता के महलनुमा घर में लौट कर सुख से रहने लगी।

उसे कई बार केवल की याद आती, लेकिन फिर वही ग़रीबी, संघर्ष और समझौते याद आ जाते और वह अपने मन को समझा लेती।

अचानक कॉलेज की घंटी बजी और विभा वर्तमान में लौट आई। वह अपनी सहेलियों के साथ कक्षा में गई, दो व्याख्यान पूरे किए और फिर घर लौट आई।

घर पहुँचते ही उसने बग़ीचे में अपने पिता को बैठे देखा। उनके साथ उनके वकील मेहता अंकल, उनकी सहायक और पिता के पीए भी बैठे थे।

“आओ विभा। मेहता अंकल तुम्हारी ही बात कर रहे थे। परसों अदालत में तारीख़ है। हमने गुजाराभत्ता दे कर या समझौते के आधार पर तलाक़ की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अदालत ने केवल को जवाब देने के लिए बुलाया है। अब तुम दोनों का रिश्ता समाप्त हो जाएगा,” पंड्या अंकल ने कहा।

“और उसके बाद मेरी बेटी अमेरिका जाएगी। किशोर भी उसकी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है। हमें सिर्फ़ हाँ कहना है,” विभा के पिता ने कहा।

विभा कुछ क्षण सबको देखती रही।

“पापा, हम बाद में बात करेंगे,” इतना कह कर वह भीतर चली गई।

दो दिन बाद अदालत में पेशी थी। विभा सुबह-सुबह अकेली ही निकल पड़ी। वह कार ले कर सीधे केवल के घर पहुँची। 
घर पर ताला लगा था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि केवल अपने गाँव जाने के लिए निकला है और अभी थोड़ी देर पहले बस स्टैंड गया है।

विभा तुरंत बस स्टैंड पहुँची। उसने देखा कि केवल एक बेंच पर बैठा बस का इंतज़ार कर रहा था।

वह उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।

“विभा, तुम आई। अच्छा लगा। मैं तुम्हें ही याद कर रहा था। मैं गाँव जा रहा हूँ,” केवल ने कहा।

“तुम अचानक गाँव क्यों जा रहे हो?” विभा ने धीमे स्वर में पूछा।

“माँ का निधन हो गया है। गाँव में समय पर इलाज नहीं हो पाया और कल रात उन्होंने अंतिम साँस ली,” केवल ने भर्राए हुए स्वर में कहा।

“और कावेरी?” विभा ने काँपती आवाज़ में पूछा।

“कावेरी की पिछले महीने ही शादी हो गई थी। वह अपने ससुराल में है। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। अगर ज़िन्दगी ने दूसरा अवसर दिया तो फिर मिलेंगे।”

कुछ क्षण रुककर केवल बोला, “अदालत में जज साहब और अपने पिता से कह देना कि तुम्हारे सारे इल्ज़ाम मुझे मंज़ूर हैं। तलाक़ के काग़ज़ मैं ने तुम्हें कुरियर कर दिए हैं। अगर मुझ से कोई भूल हुई हो तो मुझे माफ़ कर देना,” इतना कह कर केवल सामने खड़ी बस में चढ़ गया।

विभा उसे जाते हुए देखती रही। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। शायद पहली बार उसे अहसास हुआ कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि त्याग, ज़िम्मेदारी और परिस्थितियों को स्वीकार करने का नाम भी है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 तो ऽ . . .
|

  सुखासन लगाकर कब से चिंतित मुद्रा…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

सांस्कृतिक आलेख

किशोर साहित्य कहानी

कविता

ऐतिहासिक

काम की बात

सामाजिक आलेख

स्वास्थ्य

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं