विस्फोटों के बीच रोटी की पुकार
काव्य साहित्य | कविता स्नेहा सिंह15 Mar 2026 (अंक: 294, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जब धरती की छाती पर
लोहे के दानव चलते हैं,
और आकाश की नीली आँखों में
धुएँ के आँसू पलते हैं,
तब कहीं दूर किसी रसोई में
चूल्हा ठंडा पड़ जाता है,
और एक मासूम बच्चा
रोटी का अर्थ समझ जाता है।
तकनीक के चमकते पर्दों पर
हम युद्ध को लाइव देखते हैं,
पर स्क्रीन के उस पार
टूटते जीवन को कब लिखते हैं?
जहाँ एक क्लिक में मिसाइल छूटती है,
वहीं किसी माँ की गोद उजड़ जाती है,
विज्ञान की यह प्रगति
मानवता पर प्रश्नचिह्न बन जाती है।
वर्चुअल दुनिया के रंगीन जाल में
हम यथार्थ से दूर हुए,
डिजिटल सपनों के पीछे भागते
अपने ही अस्तित्व से चूर हुए।
पर जब पेट में आग लगती है,
तो डेटा नहीं, दाना चाहिए,
तब समझ आता है,
जीवन को सिर्फ़ साधन नहीं, ठिकाना चाहिए।
कभी किताबों में पढ़ा था हमने
राख से ढकी हुई वह दुनिया,
जहाँ सूरज भी बुझा-बुझा था,
और हवा में था केवल सन्नाटा गहरा।
आज वही कल्पनाएँ
हक़ीक़त की देहरी पर खड़ी हैं,
मानव के लालच की लपटें
भविष्य की साँसें जला रही हैं।
तेल की एक बूँद के पीछे
कितने शहर जल जाते हैं,
ऊर्जा की भूख में हम
अपने ही घर जला जाते हैं।
दूर कहीं युद्ध छिड़ता है,
और यहाँ महँगी हो जाती रोटी,
एक विस्फोट की गूँज में
सिमट जाती है जीवन की छोटी-सी ज्योति।
धरती की कोख से हम
उसकी साँसों से ज़्यादा निकाल रहे हैं,
एक नहीं, डेढ़-डेढ़ पृथ्वी
हर साल हम निगल रहे हैं।
नदियाँ ज़हर से भरती हैं,
पेड़ों की छाया घटती जाती है,
और इस विनाश के मेले में
मानवता चुपचाप मरती जाती है।
तोप की गर्जना जब होती है,
चूल्हे की लौ बुझ जाती है,
एक ओर विजय का नारा उठता है,
दूसरी ओर भूख सिसक जाती है।
युद्ध का हर जयघोष
दरअसल पराजय का गीत है,
जहाँ जीतता कोई नहीं,
बस हारता मानव का मीत है।
सोचो,
जब आख़िरी पेड़ गिर जाएगा,
और आख़िरी नदी भी रोएगी,
जब मछलियों की ख़ामोशी
समंदर में गूँजेगी,
तब क्या तुम अपने सिक्कों को
आग में पकाकर खाओगे?
या कृत्रिम बुद्धि से
जीवन का स्वाद पाओगे?
नहीं,
उस दिन समझ आएगा
कि रोटी सिर्फ़ आटा नहीं होती,
वह धरती की गोद,
पानी की धड़कन,
और सूरज की तपन होती है।
अब भी समय है,
विनाश की राह से लौट चलें,
प्रकृति की गोद में फिर से
अपने सपनों को बोत चलें।
स्वनिर्भरता की लौ जलाएँ,
शान्ति के बीज उगाएँ,
ताकि आने वाली पीढ़ी
हमसे यह न पूछे,
जब दुनिया जल रही थी,
तब तुम क्या कर रहे थे?
आओ,
तोपों की जगह हल उठाएँ,
और युद्ध की जगह
जीवन का गीत गाएँ।
ताकि इस धरती पर
फिर से वह सुबह आए,
जहाँ हर हाथ में हथियार नहीं,
एक गर्म रोटी हो।
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Sourabh Noroji 2026/06/16 03:40 PM
Aapki ye कविता bahut sundar hai . Mai aapse kuch margdarshan lena chata hu ki is prakar ki kavitaye kaise likh pate hai . Mai bhi kavita rachna karta hu meri profile sahitya kunj par uplabdh hai.