काला सोना और रोती हुई आज़ादी
काव्य साहित्य | कविता स्नेहा सिंह15 Apr 2026 (अंक: 295, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
आज शब्द नहीं लिख रहा हूँ,
आज मैं घाव लिख रहा हूँ
उन घावों के,
जो किसी एक शरीर पर नहीं,
बल्कि पूरी सभ्यता की आत्मा पर लगे हैं।
वहाँ . . .
जहाँ सूरज हर सुबह
रेत के माथे को चूमता है,
वहीं कहीं
धरती के गर्भ में
एक काला सपना पलता है,
तेल,
जिसे लोग दौलत कहते हैं,
पर जिसने कई देशों को
दरिद्र बना दिया।
कभी वहाँ
एक सपना था,
जनता का,
अपनी ही ज़मीन पर
अपने हक़ का
उस सपने का नाम था,
मोहम्मद मोसाद्देग
वह कोई राजा नहीं था,
न ही तलवार लेकर निकला योद्धा,
वह तो बस एक आवाज़ था,
धीमी, मगर सच्ची,
जो कहती थी,
जो धरती हमारी है,
उसकी दौलत भी हमारी होगी।
उसने जब
तेल को अपना कहा,
तो यह सिर्फ़ एक निर्णय नहीं था,
यह सदियों की बेबसी का उत्तर था।
पर स्नेहा,
सच की क़ीमत
हमेशा सबसे अधिक होती है।
दूर कहीं
लालच के महलों में बैठे लोग
चौंक उठे,
उनकी आँखों में
न्याय नहीं,
बल्कि नुक़्सान का डर था।
सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी
और
एम सोलह
ने मिलकर
एक ऐसा जाल बुना
जिसमें फँसना तय था,
एक देश,
एक सपना,
और एक सच्चा इंसान।
यह युद्ध नहीं था,
क्योंकि युद्ध में
दो सेनाएँ आमने-सामने होती हैं,
यह तो एक साज़िश थी,
जहाँ दुश्मन दिखाई नहीं देता।
लोगों के हाथों में
पत्थर थमा दिए गए,
और दिलों में
नफ़रत बो दी गई।
भीड़ बनाई गई,
भीड़ को भड़काया गया,
और फिर उसी भीड़ से
अपने ही घर को
तबाह करवाया गया।
सड़कें चीख़ रही थीं,
अराजकता।
और सत्ता मुस्कुरा रही थी,
क्योंकि यही तो चाहिए था।
फिर आया वह काला दिन,
1953 ईरान का तख़्ता पलट
जब लोकतंत्र
किसी किताब का शब्द बनकर रह गया,
और सत्ता
एक कठपुतली के हाथों में सौंप दी गई।
मोहम्मद रज़ा पहलवी
को ताज पहनाया गया,
पर उस ताज में
हीरे नहीं,
जनता की टूटी हुई उम्मीदें जड़ी थीं।
मोसद्देग,
उसे मारा नहीं गया,
क्योंकि कभी-कभी
ज़िन्दा रहना ही
सबसे बड़ी सजा होती है।
वह अपने ही घर में
क़ैद हो गया,
और उसकी खिड़की से
झाँकता हुआ आसमान
उसे हर दिन याद दिलाता,
तुमने जो सपना देखा था,
वह अब किसी और की जेब में है।
स्नेहा,
तेल बहता रहा,
नदियों की तरह,
पर उस बहाव में
ग़रीबों की प्यास नहीं बुझी,
बल्कि और बढ़ती गई।
वक़्त बीतता गया,
पर दर्द नहीं बीता।
फिर एक दिन
जनता का ग़ुस्सा
ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा,
क्रांति हुई,
तख़्त हिल गया,
सत्ता बदल गई,
पर क्या बदली ज़िंदगी?
नहीं . . .
क्योंकि जो पेड़
ज़हर से सींचा गया हो,
उस पर फल
मीठे नहीं लगते।
आज वहाँ
विद्यालय हैं,
पर विचारों पर पहरा है।
किताबें हैं,
पर सवालों पर ताले हैं।
औरतें पढ़ती हैं,
पर उनकी आवाज़
अब भी दीवारों से टकराकर लौट आती है।
और फिर,
कभी-कभी
आसमान से आग बरसती है,
और धरती
लहू से भीग जाती है।
किसी मिनाब की गलियों में
जब मासूम बच्चियाँ
धुएँ में खो जाती हैं,
तो वह सिर्फ़ एक हादसा नहीं होता,
वह एक इतिहास होता है,
जो फिर से दोहराया गया।
सत्ता फिर कहती है,
हम निर्दोष हैं।
पर सच . . .
वह किसी अख़बार के कोने में
धीरे-धीरे उग आता है,
जैसे अँधेरे में
एक ज़िद्दी दीपक।
दि न्यूयार्क टाइम्स
जैसी आवाज़ें
जब परतें हटाती हैं,
तो झूठ की दीवार
ढहने लगती है।
स्नेहा,
लोकतंत्र कोई उपहार नहीं होता,
जिसे कोई बाहरी शक्ति दे दे,
वह तो एक बीज है,
जो भीतर से उगता है।
और जब कोई
उस बीज को कुचल देता है,
तो सिर्फ़ एक पीढ़ी नहीं,
कई पीढ़ियाँ
बंजर हो जाती हैं।
तेल . . .
वह सिर्फ़ एक तरल नहीं,
वह एक श्राप है,
जब तक वह ज़मीन में है,
तब तक उम्मीद है,
पर जैसे ही वह बाहर आता है,
वह इंसानियत को जला देता है।
यह कहानी ईरान की है,
पर यह चेतावनी पूरी दुनिया के लिए है,
जब भी कोई ताक़त
भलाई के नाम पर
किसी और की दहलीज़ पार करे,
तो उसके क़दमों के निशान देखना,
कहीं वे तेल से सने तो नहीं।
क्योंकि . . .
जब लालच प्रार्थना बन जाए,
तो मंदिर, मस्जिद, गिरज़ाघर,
सब छोटे पड़ जाते हैं,
और इंसानियत
सबसे पहले क़ुर्बान हो जाती है।
और तब,
इतिहास
फिर एक नई कविता लिखता है,
पर वह कविता
कभी पढ़ी नहीं जाती,
सिर्फ़ रोई जाती है।
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