कैसे जी रहा है
काव्य साहित्य | कविता मंजु आनंद1 Jul 2024 (अंक: 256, प्रथम, 2024 में प्रकाशित)
Kease Jee Raha Hai
हर कोई जी रहा है,
कैसे जी रहा है,
यह वो ही जानता है,
दिन गुज़रता है कैसे,
कैसे कटती है रात,
यह वो ही जानता है,
तुमसे कहता है,
सब ठीक चल रहा है,
कितने बिगड़े हैं हालात,
यह वो ही जानता है,
चाहता है बतलाना,
हाल अपने दिल का,
कितना बेदर्द ज़माना है,
यह वो ही जानता है,
कैसे जी रहा है,
हर कोई जी रहा है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अपनी कुछ किताबों में
- अब आगे क्या होगा
- आँसू
- आईना
- आज फिर
- इंसान क्या है
- उम्र
- उम्र का यह दौर भी . . .
- एक गृहणी
- एक पेड़ था कभी हरा भरा
- एक बूढ़ा इंसान
- एक फ़क़ीर
- कन्यादान
- कबाड़ी वाला
- कविता
- कुछ बच्चों का बचपन
- कैसे जी रहा है
- गोल गोल गोलगप्पे
- चिड़िया
- जितनी हो चादर
- जीवन की शाम
- ढूँढ़ती हूँ भीड़ में
- दस रुपए का एक भुट्टा
- दिल तू क्यूँ रोता है
- दो जून की रोटी
- नया पुराना
- पिता याद आ जाते हैं
- पीला पत्ता
- प्यार की पोटली
- बाबा तुम्हारी छड़ी
- बिटिया
- बिटिया जब मायके आती है
- बूढ़ा पंछी
- मनमौजी
- महानगरों में बने घर बड़े बड़े
- माँ को याद करती हूँ
- माँ मेरे आँसुओं को देखती ही नहीं पढ़ती भी थी
- मायका
- मायाजाल
- मेरा क्या क़ुसूर
- वो दिन पुराने
- सर्कस का जोकर
- सुन बटोही
- हँसी कहाँ अब आती है
- हर किसी को हक़ है
- ख़्वाहिशें
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं