अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

नेताजी वोट के लिए सब खा लेंगे

 

चुनाव आते ही नेताजी जहाँ जाते हैं, भोज्य पदार्थ भी वहाँ के रीति-रिवाज़ के अनुसार परोसे जाते हैं। नेताजी भी उसी माहौल में ढल जाते हैं। नेताजी को जनता के इरादों पर ही चलना पड़ता है तब जनता समझती है कि यह अपना नेता है। 

नेताजी ग़रीब आदमी के घर गये तो ग़रीब ने टूटी खटिया पर बैठा दिया तो नेताजी ना कर ही नहीं सकते हैं। वोट का मामला था। भले इडली डोसा न खाने के भक्त हैं—दक्षिण भारतीय का वोट लेना है तो वहाँ का राष्ट्रीय भोजन इडली डोसा खाना पड़ेगा। वोट के लिए जनता अगर गधे को अपना राष्ट्रीय पशु मानकर बैठा दे तो नेताजी को वोट लेना है तो उस गधे पर बैठना ही पड़ेगा। 

उत्तर भारतीय लिट्टी-चोखा खिलाना पसंद करेंगे तो नेताजी मना थोड़ी करेंगे। नेताजी परिवर्तनशील होते हैं। जिस क्षेत्र की वोट की ज़रूरत होती है तो वहाँ की भाषा बोलेंगे। शाकाहारी हैं तो कोई फ़र्क़ नहीं है। वोट के लिए मांसाहारी तक बन जाते हैं। नेताजी रोटी-अचार भी खा लेंगे। वोट के लिए कोई हर्ज नहीं। 

जो कभी मंदिर, मस्जिद नहीं गये; वोट के लिए चले गये तो निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है। गधे को मामा कह दिये तो कौन सी इज़्ज़त की खेती बिगड़ गयी। वोट लोग नि:शुल्क देते हैं। लोगों की भावना को बदलने की कला में पारंगत नेता को वोट मिल ही जाता है। 

चुनाव के दौर में आम जनता ने नेताजी को भात-मछली खिला दिया। कुछ नेता लोग सोचे कि “ई नेताजी तो जनता के ह्रदव में वास कर जायेंगे।” कुछ ने तो टाँग अड़ा दी जो बगुला भगत वाले थे। 

अरे महोदय जी, येन केन प्रकारेण से कोई वोट का जुगाड़ बना रहा है तो किसी की नानी क्यों मरे? जिस दलित को लोग छूते नहीं थे, उनके घर में दूध-भात खा लिये तो आपका दिमाग़ ख़राब क्यों हो रहा है भाई जान?

श्रद्धावान नेता ही योग्य है जो आम जनता से निशुल्क वोट लेकर चला जाता है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

बाल साहित्य कहानी

कविता

किशोर साहित्य कहानी

बाल साहित्य कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

कहानी

लघुकथा

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं