नेताजी वोट के लिए सब खा लेंगे
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी जयचन्द प्रजापति ‘जय’1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
चुनाव आते ही नेताजी जहाँ जाते हैं, भोज्य पदार्थ भी वहाँ के रीति-रिवाज़ के अनुसार परोसे जाते हैं। नेताजी भी उसी माहौल में ढल जाते हैं। नेताजी को जनता के इरादों पर ही चलना पड़ता है तब जनता समझती है कि यह अपना नेता है।
नेताजी ग़रीब आदमी के घर गये तो ग़रीब ने टूटी खटिया पर बैठा दिया तो नेताजी ना कर ही नहीं सकते हैं। वोट का मामला था। भले इडली डोसा न खाने के भक्त हैं—दक्षिण भारतीय का वोट लेना है तो वहाँ का राष्ट्रीय भोजन इडली डोसा खाना पड़ेगा। वोट के लिए जनता अगर गधे को अपना राष्ट्रीय पशु मानकर बैठा दे तो नेताजी को वोट लेना है तो उस गधे पर बैठना ही पड़ेगा।
उत्तर भारतीय लिट्टी-चोखा खिलाना पसंद करेंगे तो नेताजी मना थोड़ी करेंगे। नेताजी परिवर्तनशील होते हैं। जिस क्षेत्र की वोट की ज़रूरत होती है तो वहाँ की भाषा बोलेंगे। शाकाहारी हैं तो कोई फ़र्क़ नहीं है। वोट के लिए मांसाहारी तक बन जाते हैं। नेताजी रोटी-अचार भी खा लेंगे। वोट के लिए कोई हर्ज नहीं।
जो कभी मंदिर, मस्जिद नहीं गये; वोट के लिए चले गये तो निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है। गधे को मामा कह दिये तो कौन सी इज़्ज़त की खेती बिगड़ गयी। वोट लोग नि:शुल्क देते हैं। लोगों की भावना को बदलने की कला में पारंगत नेता को वोट मिल ही जाता है।
चुनाव के दौर में आम जनता ने नेताजी को भात-मछली खिला दिया। कुछ नेता लोग सोचे कि “ई नेताजी तो जनता के ह्रदव में वास कर जायेंगे।” कुछ ने तो टाँग अड़ा दी जो बगुला भगत वाले थे।
अरे महोदय जी, येन केन प्रकारेण से कोई वोट का जुगाड़ बना रहा है तो किसी की नानी क्यों मरे? जिस दलित को लोग छूते नहीं थे, उनके घर में दूध-भात खा लिये तो आपका दिमाग़ ख़राब क्यों हो रहा है भाई जान?
श्रद्धावान नेता ही योग्य है जो आम जनता से निशुल्क वोट लेकर चला जाता है।
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