पूस की रात
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
पूस की रात थी
फ़ुटपाथ पर सोया था
अपनी माँ के साथ
छोटा बच्चा
भयंकर कँपकँपाहट
एक फटी चादर पर
तह की गयी दो फटी साड़ियाँ
ठंड रुक नहीं रही थी
माँ से दुबका था
ठंड से नींद नहीं आ रही थी
माँ, सबेरा कब होगा?
कोहरा और ओस से
चुभ रही है ठंडी
तू कहती थी
पापा रजाई लायेंगें
माँ अपने आँचल से
छुपाते हुए बोली—
सो जा मेरे लाल
यह पूस की रात
बड़ी निर्दयी है
थपकियाँ देने लगी
सुलाने का प्रयास करती माँ
पर ठंड से
दोनों काँप रहे थे
बड़ी निर्दयी रात है रे
सो जा
मेरे लाल
सो जा
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