मेरी दृष्टि
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
मेरी दृष्टि
वहाँ तक जाती है
उन बस्तियों तक
जिन बस्तियों में
झेलता ग़रीब का तन
विवशता से लड़ता
लाचारी का दूध पी रहा है
पूरा कुनबा
सिर्फ़ वहाँ रहती है
एक रोटी की तलाश
क्षुधा शान्त करने की
सुबह से शाम तक
तरकीब निकाली जाती है
अगले दिन का
जिनके पास
कोई भविष्य नहीं होता है
एक जहाँ अनवरत
संघर्ष का दौर होता है . . .।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
किशोर साहित्य कहानी
कविता
बाल साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कहानी
लघुकथा
ललित निबन्ध
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं