कोहरा
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
कोहरे को देखकर
डर सा लगता है
जब घना सा दिखता कोहरा
धुँध में नहीं दिखता कुछ
धीरे-धीरे चलते लोग
बड़ा मज़ा मिलता है कोहरे में
नहीं दिखती सूरज की लाली
इंतज़ार होता कोहरा छँटने का
कोहरा भी सूरज को ढके रहता
बेचारा सूरज भी ठिठुरा रहता
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