सत्य की ताक़त
आलेख | चिन्तन जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सत्य एक ऐसा तत्त्व है जिसको हर समय साथ लेकर चलना मुश्किल होता है लेकिन साथ लेकर चलने वाला व्यक्ति एक महानता की ताक़त को हासिल कर लेता है। सत्य एक ताक़तवर औषधि की तरह होता है। काफ़ी समय तक आपको प्रकाशवान पुरुष बनाये रखती है। सत्य के बिना जीवन को प्रकाशवान नहीं किया जा सकता है।
सत्य एक लम्बी अवधि का होता है। ठोकरें तथा थपेड़े ज़रूर सहता है लेकिन परिपक्व समय के साथ परिपक्व हो जाता है। सत्य अगर बोलने वाला व्यक्ति है तो वह दबाव के बावजूद भी सत्य बोलेगा। स्वतंत्र रूप से सत्य को अपनाने वाला एक अडिग प्राणी होता है। निर्भीक होता है। कोई डरावनी ताक़त उसको अपने पथ से विचलित नहींं कर सकती है। अनवरत वह सत्य पथ पर चलता है और चलता रहेगा।
अगर आप भयभीत हैं तो सत्य को बीच में छोड़ देंगे। भय से व्यक्ति सत्य का परित्याग कर देता है। उसके अंदर भय का मंज़र आ जाता है। यह भय उसके अंदर की शक्ति को हिलाकर रख देती है। अंदर से झकझोरा व्यक्ति सत्य की राह से विचलित हो जाता है और वह कुमार्ग का रास्ता अपना लेता है। उसकी दिशा अँधेरे की तरफ़ हो जाती है जहाँ घोर संकट नज़र आने लगता है।
सत्य को प्राप्त करने के लिए एक तपस्या की ज़रूरत होती है। एक तपस्वी का गुण होना चाहिए। न विचलित होने वाला भाव का होना नितांत आवश्यक है। धैर्य का गुण भी होना ज़रूरी है। एक दिन से सत्य बोलने की ताक़त नहींं मिल सकती है। प्रतिदिन जीवन में उतारना पड़ेगा और इस सत्य की धारा में ख़ुद उतर कर डुबकी लगाकर सत्य को प्राप्त किया जा सकता है।
सत्य को पराजित तथा परेशान करने वाली तमाम शक्तियाँ विचरण कर रही हैं। असत्य के सामने सत्य डर सकता है क्योंकि असत्य हथियारों से सुसज्जित रहता है। कमज़ोर सत्य मैदान छोड़कर कर भाग जायेगा लेकिन असली सत्य बिना जान की परवाह किये मैदान में डटा रहेगा। वीर योद्धा सत्य का दामन मरणोपरांत भी हृदय में सँभालकर रखता है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
25 वर्ष के अंतराल में एक और परिवर्तन
चिन्तन | मधु शर्मादोस्तो, जो बात मैं यहाँ कहने का प्रयास करने…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
चिन्तन
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
बाल साहित्य कहानी
कविता
किशोर साहित्य कहानी
बाल साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
कहानी
लघुकथा
ललित निबन्ध
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं