चींटी गुड़ खाती है
बाल साहित्य | बाल साहित्य कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
चींटी रोज़ मेरे घर आती है,
झोले में रखा गुड़ खाती है।
गुड़ खा-खाकर ख़ूब हँसती है,
अपने बच्चों को भी लाती है।
एक दिन चींटी नहीं आयी,
क्यों नहीं आज वह आयी।
पता करने मैं घर पर गया,
वहाँ किसी को नहीं पाया।
पड़ोसी से पूछा, कहाँ गयी है?
वह बोला-दवा लेने गयी है।
गुड़ खाने से हुआ यह हाल,
दवा खाने से सही है अब हाल।
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