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पश्चात्ताप

 

ऋतु को तितलियाँ बहुत अच्छी लगती थीं, पर वह उनके साथ ग़लत खेल खेलता था। वह तितलियों को पकड़कर उनके रंग-बिरंगे पंख तोड़ देता था। बेचारी तितलियाँ फड़फड़ाकर ज़मीन पर गिर जातीं, उड़ नहीं पातीं, पर ऋतु को यह देखकर बहुत मज़ा आता। ऋतु का दोस्त शनि यह सब देखकर दुखी हो जाता। 

एक दिन शनि ने कहा, “ऋतु, यह बहुत गंदा काम है। तितलियाँ भी तो हम जैसे जीती-जागती होती हैं। जब तुम उनके पंख तोड़ते हो, उन्हें बहुत कष्ट होता है। सोचो, अपने घर कैसे जाएँगी?” लेकिन ऋतु ने हँसकर बात टाल दी, “अरे, ये तो छोटी-सी तितलियाँ हैं, इन्हें क्या होगा!” 

कुछ दिन बाद ऋतु अपनी साइकिल पर तेज़-तेज़ जा रहा था। अचानक पीछे से एक स्कूटर ने हल्की-सी टक्कर मार दी। ऋतु गिर पड़ा और उसका पैर चोटिल हो गया, वह उठ नहीं पा रहा था। उसके पैर में इतनी ज़ोर की चोट लगी कि वह दर्द से कराहने लगा, “आह! मेरा पैर . . . मैं कैसे चलूँ? मैं घर कैसे जाऊँ?” तभी वहाँ शनि दौड़ता हुआ आया। उसने ऋतु को उठाने की कोशिश की। ऋतु रोते हुए बोला, “शनि, मैं चल नहीं पा रहा . . . मैं घर कैसे जाऊँ?” 

शनि ने गंभीर होकर कहा, “जैसे तितलियाँ जाती हैं, जब तुम उनके पंख तोड़ देते थे . . . याद है? वे भी तो अपने घर जाना चाहती थीं, पर उड़ नहीं पाती थीं।” शनि की बात सुनकर ऋतु चुप हो गया। उसे उन सब तितलियों की याद आ गई जिनके पंख उसने तोड़े थे। उसे लगा जैसे तितलियाँ भी उसी की तरह दर्द से रो रही हों। 

ऋतु की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “शनि, मुझसे बहुत ग़लती हो गई। मैंने तितलियों के साथ बहुत बुरा किया। शायद आज मेरी ये चोट भी उसी ग़लत काम का परिणाम है। मैं वादा करता हूँ, अब कभी किसी तितली, किसी जानवर या किसी भी छोटे जीव को तकलीफ़ नहीं दूँगा। प्लीज़, मुझे माफ़ कर दो।” शनि ने मुस्कुराते हुए उसका कंधा थाम लिया, “ग़लती मान लेना ही सबसे बड़ी बहादुरी है, ऋतु। चलो, पहले तुम्हें अस्पताल ले चलते हैं।” 

शनि ने लोगों की मदद से ऋतु को अस्पताल पहुँचाया। डॉक्टर ने उसका पैर पट्टी से बाँध दिया और आराम करने को कहा। कुछ दिनों बाद जब ऋतु ठीक हो गया, तो वह बग़ीचे में गया। वहाँ उसे फिर एक तितली दिखी। इस बार उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया, पर पकड़ने के लिए नहीं, धीरे से तितली को देखने के लिए। तितली फूल पर बैठी थी और हवा में अपने पंख हिला रही थी। ऋतु ने मुस्कुराकर कहा, “अब से मैं तुम्हारा दोस्त हूँ। मैं किसी का पंख नहीं तोड़ूँगा, बस तुम्हें उड़ते हुए देखूँगा।” 

तितली जैसे उसकी बात समझ गई हो, हल्के से उड़कर आसमान में चली गई। अब ऋतु जब भी कोई तितली देखता, तो उसे प्यार से उड़ने देता और अपने दोस्तों से कहता, “छोटे-छोटे जीवों को तकलीफ़ देना बहुत बुरी बात है। वे बोल नहीं पाते, पर दर्द उन्हें भी उतना ही होता है जितना हमें होता है।” और सचमुच, उस दिन के बाद ऋतु सबका, यहाँ तक कि छोटी-सी तितली का भी सच्चा दोस्त बन गया। 

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