उषा का आगमन
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
उषा की आ रही है सवारी
नवगीत गा रही मधुबेला
नव लय है, नव ताल से सजा है
प्रेम रस से भीग रही है उषा
कल-कल करती नदियाँ
कलरव करती चिड़ियाँ
उषा वधू के स्वागत करने
नभ में छाये सारे तारागण
मधुमय हुई है उषा की बेला
चंचल सा तन मन हो गया है
चिड़ियों के कलरव से गूँजा आसमां
उषा की लालिमा से सज गया आसमां
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कविता
- आदिवासी बच्चियाँ
- उनका हिस्सा
- उषा का आगमन
- एक थे अटल
- एक नाबालिग़ लड़की
- कोहरा
- कोहरे में
- देश के नेताओ
- निष्ठुर समय
- पर्वत, जो मूक खड़े हैं
- पीढ़ियाँ
- पूस की रात
- बसंत
- मत सताना
- मेरी कवितायें
- मेरी दृष्टि
- मैंने भागकर शादी कर ली
- वह मज़दूर
- सर्दी में एक स्त्री
- सुकून चाहता हूँ
- हम वेश्या हैं
- हँसने दो
- हारे लोग
- हे नवांकुरो
बाल साहित्य कविता
चिन्तन
बाल साहित्य कहानी
किशोर साहित्य कहानी
हास्य-व्यंग्य कविता
कहानी
लघुकथा
ललित निबन्ध
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं