पर्वत, जो मूक खड़े हैं
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
पर्वत एक विशाल तन लिये
एक अचल मन लिये
एक विश्वास के साथ
देता है हौसला हमको
मुसीबतों में
खिलखिलाकर हँसने की
एक चेतना देता है
कई थपेड़े सहकर
मूक खड़े हैं पर्वत
जो अविचलित है
जीवन की हर मार सहकर
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