हारे लोग
काव्य साहित्य | कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’15 Jul 2026 (अंक: 301, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
हारे लोग
थके से लगते हैं
जीवन से
आनन्द नहीं मिल रहा है
पसीने से भीगे
अलग हटकर
सोचने वाले
तुम पटरी से
ज़रूर उतर गये हो
एक बार
फिर से खड़े हो
पुनः पटरी पर
आ जाओ
एक रफ़्तार
फिर आयेगी
तब तुम
आत्महत्या नहीं करोगे
एक वीर पुरुष
तुम्हें कहा जायेगा
तुम रणक्षेत्र में
एक योद्धा की तरह
कामयाब होगे
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