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तोते का जूठा

 

स्कूल में उसकी हाज़िरी तो भगवन्त के नाम से लगती थी; पर उसे सब भगु कहकर बुलाते थे। भगु सबसे ज़्यादा पढ़ता था। और मास्टर जी का डण्डा भी सबसे ज़्यादा उसी पर फिरता था; क्योंकि सारा दिन पढ़ने के बावजूद उसे कुछ आता-जाता नहीं था। जब आधी छुट्टी के समय सारे बच्चे खेलने के लिए बाहर निकल जाते थे, तब भी भगु, कक्षा के कमरे में अकेला बैठा पढ़ता रहता था।

कक्षा के सभी बच्चों की गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने वाले, मास्टर रामनाथ जी ने आख़िर भगु के ट्रक ड्राइवर बाप को स्कूल में बुला ही लिया, “मैं क्या करूँ? इतनी मेहनत से पढ़ाने के बावजूद, आपके बच्चे के दिमाग़ में कुछ पड़ता ही नहीं। मैंने जैसे-तैसे खींचकर इसे आठवीं तक पहुँचा दिया है; पर आगे बोर्ड की परीक्षा है . . .?”

भगु का बाप मास्टर जी के कहने का मतलब समझकर, भगु से बोला, “पुत्र! उठा बस्ता और चल घर। मैं ट्रक में लोड बजरी ख़ाली करके आता हूँ। कल से तू मेरे साथ चलना, दोनों बाप-बेटा ट्रक चलाएँगे।”

जाते समय भगु, कुछ इरादा करके, बड़े याचना भरे स्वर में मास्टर जी से बोला, “मास्टर जी! अभी मेरा नाम नहीं काटना।”

जिसे सुनकर, मास्टर जी ने एकबार उसकी तरफ़ देखा, फिर मुँह फेर लिया।

शाम को जब भगु का बाप ट्रक ख़ाली करके घर वापस आया तो उसे पता चला कि भगु स्कूल से घर पहुँचा ही नहीं है। जिससे भगु के घर में कोहराम मच गया। भगु की इधर-उधर तलाश शुरू हो गई। आख़िर ख़बर मिली कि, भगु को अमरूदों के बाग़ के माली ने बाँध रखा है . . . जिसे सुनकर, सभी लोग उस बाग़ की तरफ़ चल पड़े। इतने लोगों को आता देखकर, माली ने भगु को तुरन्त छोड़ दिया। भगु का बाप बड़ा ग़ुस्सा करते हुए, भगु से बोला, “मैं तेरे लिए हर रोज़ केले, सेब लेकर आता हूँ . . . तू इस बाग़ में क्या लेने आया है?”

“पढ़ाई लेने आया हूँ,” भगु के मुँह से निकला।

“पढ़ाई . . . ?” भगु के बाप की समझ में कुछ न आया।

“बापू! क्या आपको पता नहीं है कि, तोते का जूठा खाने से पढ़ाई आ जाती है? . . . मैंने आज तोते का जूठा अमरूद खा लिया है . . . तोते ने चोंच मारकर, मेरे सामने उस अमरूद को गिराया था . . .” भगु बड़ा प्रफुल्लित होकर बोले जा रहा था। 

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