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जिसकी लाठी उसकी भैंस

"जिसकी लाठी, उसकी भैंस" बचपन में पढ़ा तो मेरी नज़र हमेशा लाठी लिए व्यक्ति को ताकती रहतीं। सही भी लगा। मैंने देखा, कोई व्यक्ति हाथ में लाठी लिए जा रहा है और उसकी भैंस कभी पगुराती, कभी बीच- बीच में अड़ती, रुकती चली जा रही है। कभी-कभी पुलिस वालों को भी लाठी लिए देखता तो हैरानी होती। इनके पास भैंस क्यों नहीं?  मगर पुलिस वालों का भय गोदी में रहने की ही उमर में इतना भर दिया जाता है कि पुलिस वालों को देखते ही कहीं छुपने की इच्छा होने लगती है। फिर उनके बारे में सोचने का जिगर आम आदमी के पास कहाँ? और मैं तो तब छोटा बच्चा था।

एक बार ऐसे ही एक दिन पापा के साथ एक जगह से गुज़र रहा था तो एक बड़े घर के आँगन में नज़र पड़ी। देखा, ढेरों लाठियाँ रखीं हुईं थीं। मैंने पापा से पूछा, "पापा! इनके पास इतनी लाठी हैं। इनके पास तो बहुत भैंस होंगी?"

'चुप रह' कहते हुए पापा मुझे घसीटते हुए और तेज़ चाल चलते हुए जल्दी से घर ले आए।

घर आकर समझाते हुए बोले, "बेटा! कहाँ, क्या पूछना है, इसका ध्यान रखा करो। जिस घर के बारे में तुम पूछ रहे थे, वे बहुत बड़े लोग हैं। उनके यहाँ पुलिस वाले तक दौड़े चले आते हैं। भैंसे यदि नदी-नाले में लोरी हुईं हों या कहीं चारा चर रही हों, इनके एक इशारे पर फ़ौरन दौड़ी चली आती हैं। इनको भैंस की कभी ज़रूरत नहीं पड़ती बल्कि भैंस को इनकी ज़रूरत पड़ती है। अतः जब भी ऐसे सवाल मन में आयें तो मुँह में ही गटक लिया करो। इनके जवाब के लिए परेशान होने की अभी ज़रूरत नहीं। उम्र के साथ इनके जवाब अपने आप मिलने लगते हैं।"

जैसे-जैसे समय बढ़ा . . . बीता; सब कुछ बदलता गया . . . और इसके साथ 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' वाली कहावत  का रूप भी बदला और निखरा। नेताओं का अवतरण नये क़िस्म में हुआ। उन्हें देर नहीं लगी, इस व्यवस्था को समझने में। वे सत्ता को लाठी और शासन-प्रशासन को भैंस का रूप समझने लगे और फिर वे इसे हथियाने में लग गए। उन्हें सत्ता सेवा की बजाय मेवा नज़र आने लगी। वो समझने लगे यदि सत्ता रूपी लाठी उनके हाथ में होगी तो वो जो करेंगे वह ही क़ानून होगा और जो कहेंगे वह आदेश होगा।

असल में इस सब में सिर्फ़  लाठी का ही नहीं, भैंस का भी योगदान रहता है। वह भी लाठी वाले की तरफ़ खिंची चली आती है। शायद इसीलिए ही यह कहा गया है 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस’, क्योंकि जिसके पास लाठी होती है, वह उसे ही मालिक मानती है . . . अपना भगवान . . . अपना सब कुछ समझती है। वह यह मानती है कि जिसके पास लाठी है, वह ही उसे विपत्ति में बचायेगा। सड़क पर से जब वह झुंड में निकलेगी तब बेतरतीब और तेज़ गति से दौड़ने वाले वाहनों से यह लाठीधारी ही उन्हें बचायेगा और आसानी से उन्हें रास्ता पार करा देगा। नदी-नालों में जब वे लोट लगायेगी, यह लाठीधारी ही उन्हें लेने आयेगा और पुचकार कर घर ले जायेगा। सुबह-शाम यह लाठी वाला ही तो उन्हें चारा डालेगा। उनकी भूख बुझायेगा। बदले में उन्हें सिर्फ़ दूध ही तो देना है। वह भी, कौन बाज़ार से ख़रीदकर देना है?

वह तो ये विरोधियों ने आकर अंकुश लगाना चालू कर दिया और बना बनाया खेल बिगाड़ने लगे वरना सब अच्छा चल रहा था। ख़ैर. . .!

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