प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 010
काव्य साहित्य | कविता - क्षणिका प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'1 Mar 2022 (अंक: 200, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
1.
सोचती हूँ,
इतने बरसों तक,
तुमने मेरी मुस्कुराती छवि को
अपने हृदय में
कैसे सम्भाल कर रखा होगा . . .
इतने बरसों में,
मैं तो ख़ुद को ही
न जाने कहाँ
रखकर भूल गई . . .!
2.
लगता है, कल रात
तुम फिर रोयी थी . . .
तुम्हें कैसे पता . . .
सुबह उठा, तो
मेरे कुर्ते का बायाँ कँधा
कुछ सीला सा था . . .
हाँ, मैं उसी तरफ़ सोती थी!
3.
बिखरते हैं,
समेटती हूँ . . .
फिर बिखरते है,
फिर समेटती हूँ . . .
रोज़ इतनी मेहनत
क्यों करती हूँ . . .?
सपनें हैं,
ऐसे कैसे छोड़ दूँ!
4.
कई बार
राह पलटकर देख ली,
कुछ दुखते हुए पल
रूबरू हो ही जाते हैं . . .
ये,
हम दोनों की
पुरानी आदत है।
5.
जाने क्यों
हर वक़्त
कारण ढूँढ़ते हैं,
पहले भी तो
बेवक़्त,
बेबात,
बेहिसाब
हँसा करते थे . . .!
6.
मैं कहती रही
तुमने सुना ही नहीं,
कहने सुनने को अब
कुछ रहा ही नहीं . . .
7.
कभी मौक़ा,
तो कभी अल्फ़ाज़,
ढूँढ़ती रह गयी . . .
मेरे दिल की
मेरे
दिल में ही रह गई।
8.
मुसाफ़िरी की हमको
है आदत पड़ी . . .
हर वक़्त पुकारे
है मंज़िल नयी!
9.
अल्हड़ नदी
राह पथरीली,
छिलती
दुखती
किसी से
कुछ न कहती,
मीठी की मीठी . . .
कुछ कुछ,
मुझ सी . . .!
10.
राहें,
दोराहें,
चौराहें बनी
राहगीर बँटते गए . . .
ज़िन्दगी चलती रही . . .!
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
अनुभूतियाँ–001 : 'अनुजा’
कविता - क्षणिका | प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'1. हर लम्हा है मंज़िल, अरे बेख़बर! ये न लौटेगा…
अनुभूतियाँ–002 : 'अनुजा’
कविता - क्षणिका | प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'1. अभी तो ख़्वाबों पर पहरे नहीं हैं,…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
लघुकथा
कविता - हाइकु
कविता-माहिया
कविता-चोका
कविता
कविता - क्षणिका
- अनुभूतियाँ–001 : 'अनुजा’
- अनुभूतियाँ–002 : 'अनुजा’
- प्रीति अग्रवाल 'अनुजा' – 002
- प्रीति अग्रवाल 'अनुजा' – 003
- प्रीति अग्रवाल 'अनुजा' – 004
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 001
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 005
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 006
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 007
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 008
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 009
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 010
- प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 011
सिनेमा चर्चा
कविता-ताँका
हास्य-व्यंग्य कविता
कहानी
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं