प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 011
काव्य साहित्य | कविता - क्षणिका प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'1 Jun 2022 (अंक: 206, प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
1.
मैं नदिया होकर
भी प्यासी,
तुम सागर होकर
भी प्यासे,
'गर ऐसा है
तो ऐसा क्यूँ,
दोनों पानी . . .
. . . दोनों प्यासे!
2.
उनींदी अँखियाँ
तलाशती सपनें
जाने कहाँ गए
यही तो हुआ करते थे . . .
उनके पूरे होने की आस में
हम दोनों जिया करते थे . . .।
3.
करिश्मे की चाहत में
कटते हैं दिन,
हम ज़िंदा हैं
करिश्मा ये
कम तो नहीं . . .!
4.
मेरी कमरे की खिड़की
छोटी सही . . .
उससे झाँकता जो सारा
आसमां, वो मेरा है!
5.
यूँ तो होते हो
पास, बहुत पास
हर पल . . .
शाम होते ही मगर
याद आते हो बहुत।
6.
जानती हूँ मुझसे
प्रेम है तुम्हें,
दोहरा दिया करो
फिर भी,
सुनने को जी चाहता है . . .!
7.
चलना सम्भल के
इश्क़ नया है . . .
सम्भल ही गए
तो, इश्क़ कहाँ है!
8.
रिश्ते
बने कि बिगड़े
सोचा न कर
थे सिखाने को आए
सिखाकर चले . . .।
9.
तुम्हारे कहे ने ही
दिल को
छलनी कर दिया,
अनकहे तक तो हम
अभी पहुँचे ही नहीं . . .!
10.
गिनवाते रहे
तुम अपने गिले,
हम इस क़द्र थके
कोई शिकवा न रहा . . .।
11.
एक बार बचपन में
चाँदी का सिक्का उछाला था
चित-पट तय हो ही न पाई
वो जाकर
आसमान में जड़ गया,
वही तो है
जो चाँद बन गया!
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