प्रीति अग्रवाल 'अनुजा' – 002
काव्य साहित्य | कविता - क्षणिका प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'15 Dec 2020 (अंक: 171, द्वितीय, 2020 में प्रकाशित)
1.
मुझसे नहीं,
पिया ख़ुद से,
हैं रूठे . . .
समझती हूँ मैं,
मैं उन्हें
जानती हूँ . . .।
2.
क्यों
रूठने
मनाने में,
ज़ाया करें . . .
ये दिन
है मुक़द्दस,
फिर मिले . . .
न मिले . . .!
3.
लगता है
दिल से दिल को,
फिर, राह
हो रही है . . .
बिन कहे
बिन सुने,
सारी, बात
हो रही है . . .!
4.
ख़ामोशी भी
करती है
बातें
मगर . . ..
सुने
कोई कैसे . . .!
फ़ुर्सत
कहाँ है . . .?
5.
ये
बेचैनी,
बेक़रारी,
अनमोल है
मु्फ़्त है . . .
इंतज़ार का भी,
अपना ही
लुत्फ़ है . . .!
6.
दिल को
आज अपने,
ज़रा साफ़ कर लें . . .
कहा सुना
सबका, चलो
माफ़ कर लें . . .!
7.
नेह के
कुछ धागे,
तुम्हारे कोट के
बटन में,
शायद
उलझे रह गए . . .
तुम, चलते
जा रहे हो . . .
मैं, उधड़ती
जा रही हूँ . . .!
8.
सपने
हमारे भी
सच हो जाते . . .
'गर
नींद आती, हम
सपने सजाते . . .!
9.
मेरे
रोने पे रोते हो,
हँसने पे हँसते . . .
कहो तो भला,
तुम
मेरे कौन हो . . .?
मेरे
पूछने से पहले,
आईना
पूछ बैठा . . .!
10.
बादलों को
हवाओं से,
इश्क़ हो गया है . . .
चल देते हैं
संग संग,
जहाँ भी वो जाएँ . . .!
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