प्रीति अग्रवाल ’अनुजा’ – 001
काव्य साहित्य | कविता - क्षणिका प्रीति अग्रवाल 'अनुजा'15 Nov 2020 (अंक: 169, द्वितीय, 2020 में प्रकाशित)
1.
सोचे समझे बिना
करें सब पे यक़ीं,
अच्छे लोगों की भी
कुछ आदतें बुरी हैं!
2.
हर ख़ुश दिखने वाले में
ख़ुशी नहीं होती . . .
जैसे,
हर ज़िंदा शख़्स में
ज़िन्दगी नहीं होती!
3.
यूँ उठती हैं लहरें
मानो छू लेंगी चाँद . . .
भरम में जीने वालों की
कमी तो नहीं!
4.
गुज़रते वक़्त के साथ
हम भी गुज़र जाएँगे . . .
सफ़र पूरा तभी होगा
जब,
आगे सफ़र पे जाएँगे!
5.
टूटे दिल का ये दर्द
भला ज़ाया क्यों हो,
चलो इसपे कोई
ग़ज़ल आज कह दें।
6.
है ये कैसा शहर
कि यहाँ पर सभी,
सब को जानते तो हैं
पर पहचानते नहीं!
7.
ख़ुशियाँ,
किसी की मोहताज नहीं,
ख़ुश्मिज़ाजी तो फ़ितरत है
या तो है . . .
या नहीं . . .!
8.
फ़ासले हम भला
तय करते, भी तो कैसे . . .
रास्तें ख़ुद ब ख़ुद
मुड़ते चले गए . . .।
9.
चाहे गीत लिखूँ मैं
या कोई ग़ज़ल,
ज़िक्र तेरा ही होगा
अंजाम भी वही . . .!
10.
दरया ए इश्क़ है
ये बहा के रहेगा . . .
इसे कब फ़िक्र
कोई क्या कहेगा . . .!
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