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बच्चो! खेल-खेल में झगड़ो मत

बच्चो! बचपन में खेलकूद का एक अलग ही आनंद है, अलग ही महत्व है। खेलने से मनोरंजन तो होता ही है, खेल की उछल-कूद से शरीर में स्फूर्ति आती है, जिससे शारीरिक और मानसिक विकास होता है। इसके अलावा खेलों से मिलकर रहने यनी एकजुट बने रहने की आदत भी बनती है। क्योंकि जब तक आपस में मिलकर नहीं रहेंगे, खेलना मुश्किल होता है। किसी खेल में दो सदस्य होते हैं तो किसी खेल में दो से अधिक। किसी खेल में दो दल होते हैं तो किसी खेल में दो से अधिक। अतः सदस्य या दल कितने भी हों, जब तक आपस में धैर्य, संयम और खेलने के नियमों का पालन नहीं होगा तब तक न तो खेल में मज़ा आयेगा, न ही खेल आसानी से पूरा होगा और न ही खेल के परिणाम मिल पायेंगे। ऐसे में खेल से न मनोरंजन होगा और न ही कुछ सीख पायेंगे। अतः खेल के परिणाम पाने के लिये हम मिलकर खेलने, एक-दूसरे की सहमति, नियमों का पालन यानी अनुशासन में रहने की आदत बनानी चाहिये और यही आदत जीवन में सफलता दिलाने में सहायक होती है।

बच्चो! जैसा कि सभी जानते हैं खेल के दो प्रकार होते हैं।

एक-ऐसे खेल जो हॉल या यूँ कहें कि घर में खेले जाते हैं, जैसे- कैरम, शतरंज, बेडमिंटन, टेनिस, लूडो, चौपड़ आदि।

दूसरा- किक्रेट, कबड्डी, हाकी, फुटबॉल, खो...खो, क्षेत्रीय खेलों में- पिट्टू, नदी-पहाड़, छिया-छिलाई, लुक्का-छिप्पी आदि।
बच्चो! खेल में खिलाड़ी के साथ-साथ निर्णायक की भी अहम भूमिका होती है। निर्णायकों की भूमिका को दो भागों में बाँटा जा सकता है - 

एक - इसमें शाला, संस्थाओं या अन्य किसी आयोजकों के द्वारा प्रतियोगिताओं के रूप में खिलाये जाने वाले खेल। इनमें खेल के निर्णय करने वाला कोई और होता है।

दूसरा - ऐसे खेल जो बच्चे आपस में ही तय कर खेलते हैं। इनमें निर्णय करने वाले भी वही होते हैं और खेलने वाले भी वही होते हैं।

जो खेल बिना निर्णायक के खेले जाते हैं, उनका अपना एक अलग मज़ा होता है। ऐसे खेल अक्सर स्कूल में ख़ाली समय में अपने सहपाठियों के साथ या अपने निवास के आसपास रहने वाले हमउम्र के घरेलू मित्रों के साथ आकस्मिक या अवकाश का समय मिलने पर खेल लिए जाते हैं। 

ऐसे खेल जिनमें खेलने वाले भी आप और निर्णय लेने वाले भी आप होते हैं, तब खेल में जो प्रेम, विश्वास और अपनत्व होता है; वह मित्रता को और मज़बूत बनाता है। चूँकि उस समय निर्णायक भी आप होते हैं तो आप में खेल की बारीक़ियों, सावधानियों के साथ-साथ सजग रहने की सामर्थ्य में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। आपको जीत-हार की चिंता नहीं होती। आप उस समय खेल का आनंद बड़ी ही तन्मयता से निश्चिंत होकर लेते हैं। यही तुम्हें ऊर्जावान बनाने में सहायक होती है। यही उस खेल का अभ्यास करना कहलाता है और ऐसे ही खेलने से आप उस खेल में निपुण होते चलते हैं। आपको इसका भी ज्ञान हो जाता है कि आप किस खेल को आसानी से, दक्षता से खेल सकते हैं। यही ज्ञान आपको उस खेल में विशेष रुचि और उत्साह बनाते हुये भविष्य में उस खेल का उत्तम खिलाड़ी बनाने में सहायक होगा।

बिना निर्णायक वाले और भी ऐसे स्थानीय (क्षेत्रीय) खेल होते हैं, जो किसी प्रतियोगिता में शामिल नहीं हैं, सिर्फ़ मनोरंजन के उद्देश्य से खेले जाते हैं, किंतु इनमें भी मनोरंजन के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक विकास का लक्ष्य निहित होता है। 

जो खेल संस्थाओं, शालाओं या अन्य प्रतियोगिताओं में खेले जाते हैं, उनमें निर्णायक भी अलग से होते हैं। उनकी देखरेख में ही खेल खेले जाते हैं। ऐसे में उन्हीं खिलाड़ियों का चयन किया जाता है जो उस खेल में विशेष दक्षता रखते हैं।

शालाओं या संस्थाओं में खेल के अभ्यास के समय भी निर्णायक होते हैं। ऐसे में खेल का अभ्यास करते समय आपको श्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाने की आवश्यकता होती है।

अतः स्थितियाँ एवं परिस्थितियाँ कैसी भी हों, आपको अन्य खिलाड़ियों के साथ रहकर, मिलकर खेलना ही पड़ेगा। आपके स्वभाव में धैर्य, प्रेम और भाईचारे की भावना जागृत करनी होगी । 

यदि आप खेल में ज़िद, मनमानी, रौब दिखाने की कोशिश कर खेल में बाधा पैदा करेंगें तो आपको खेल में शामिल नहीं किया जायेगा। ऐसे में खेलने के लिये आपको न तो अवसर प्राप्त हो पायेंगे, न ही अपनी श्रेष्ठता हासिल कर पायेंगे। और तब ऐसी स्थिति भी बन सकती है कि आप इस उपलब्धि से सदा-सदा के लिये वंचित हो जायें।

आप यदि खेल में रुचि रखते हैं, खेल से मनोरंजन चाहते हैं तो आपको अपने आप से समझौता करना पड़ेगा। आपको खेल के माध्यम से अपना भविष्य उज्जवल और सफल बनाना है तो आप यह बात याद रखें कि खेल से भाईचारे की और विश्वास करने की भावना मज़बूत बनती है। निष्पक्ष न्याय करने का गुण पनपता है।
 
खेलते समय नियमों के पालन करने का ध्यान रखने से मन को एकाग्र रखने की, सावधानी बरतने की क्षमता में वृद्धि होती है।

खेल में जीतने की ललक से उत्साहित रहने, मेहनत करने और दृढ़ इरादे से संकल्प शक्ति में अपार वृद्धि होती है।

अतः यह बात यहाँ जानने और समझने की बहुत ज़रूरी है कि खेल जितना मनोरंजन करते हैं, उससे कहीं अधिक वे चरित्र को सजाने और सँवारने के लिये स्वभाव एवं व्यवहारिक ज्ञान को सुदृढ़ बनाने का काम भी करते हैं। शरीर को निरोग और बलिष्ठ बनाने में सहायक होते हैं।

इसीलिये खेलते समय आपस में सौहार्द और निष्पक्षता बनाये रखनी चाहिये। कभी भी चालाकी, रौब दिखाना, ज़िद, लड़ना-झगड़ना आदि दुर्गुणों से बचना चाहिये। इससे खेलने का मज़ा तो बिगड़ेगा ही, आपसी व्यवहार में भी कटुता आयेगी जो अनेक मुसीबतें पैदा करेगी। आपको सभी झगड़ालू मानेंगे। आपको खेल में शामिल करने से बचने की कोशिश करेंगे। इससे धीरे-धीरे आप में हीनभावना आनी शुरू होगी। आप में चिड़चिड़ापन आने लगेगा और आप धीरे-धीरे अंदर ही अंदर शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर होने लगेंगे। जो आपके सफल और सुखी जीवन के लिये अच्छा नहीं होगा।

अतः यह बात मन में दृढ़ता से बिठा लेनी चाहिये कि खेल में कभी लड़ाई-झगड़ा न करें, न किसी को करने दें। यदि खेल में कभी कोई असहमति की स्थिति बनती है तब अपने आसपास के किसी बुज़ुर्ग को पूरा विवरण बताकर उनके निर्णय को मान लें, टॉस से निर्णय ले लेवें या विनम्रता दिखाते हुये सामने के पक्ष से सहमत हो जावें परंतु लड़ाई-झगड़ा बिल्कुल भी न करें। शोर-शराबा, उपद्रव न मचायें। न ही गाली-गलौज करें। यदि आपने ऐसी स्थिति में धैर्य और शांति बना ली तो आपकी इस सामर्थ्य शैली से आप अपने जीवन में कोई भी ऐसी विषम या विवादस्पद स्थिति से निपटने और निकलने में सदैव सफल होते रहेंगे।

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