अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

छोटे लोग

किसन ने अपनी धुली-धुलाई  चमचमाती रिक्शा को स्कूल की दीवार के कोने से सटे बड़े से पीपल की ओट में रोका और सावधानी से मुनिया और उसकी माँ को उतारा।

यूँ तो वो रोज़ ही स्कूल आता था, बच्चों से चहकती हुई, लदी-पदी रिक्शा लेकर, पर आज का दिन कुछ ख़ास था। उसने साफ़-सुथरे सफ़ेद कुर्ता और धोती पहन रखे थे। मुनिया की माई ने भी आज अपने बक्से से निकाल कर सबसे अच्छी साड़ी पहनी थी और मुनिया की ख़ुशी का तो ठिकाना ही न था। उसने कई वर्ष बाद, नई फ़्रॉक जो पहनी थी!

आज नई क्लास में दाख़िले का दिन था और वे भी  अरमानों और हिम्मत की पोटली जुटाकर, प्रिंसिपल मैडम से विनती करने पहुँचे थे कि बिटिया का भविष्य सुधर जाए, जो उसे उनकी छत्रछाया मिल जाये!

लाइन में लगे लोगों का रौब और रुतबा देखकर एक बार तो मन डूबा और पैर ठिठके, फिर आस का दामन थामे, राम का नाम जपते, वे भी लाइन में लग गए . .

आस-पास के लोगों ने वही किया जो अक़्सर किया करते हैं . . . नाक-मुँह सिकोड़े  . . . और खुसर-पुसर करने लगे . . . 'ज़ुर्रत तो देखो, कहाँ हम और कहाँ ये . . . जाने क्या सोच कर चले आते हैं . . .'

बारी आने पर वे कमरे में हाथ जोड़कर दाख़िल हुए तो प्रिंसिपल मैडम आश्चर्य से बोली, "अरे, आओ किसन, कैसे आना हुआ, सब ठीक तो है," . . . फिर साथ मे पत्नी और मुनिया को देख असमंजस में पड़ गईं . . . 

"मैडम जी, ई हमार पत्नी और बिटिया है, . . . छोटो मुँह बड़ी बात . . . बस ईको आप अपनी सरन में ले लो  . . . जी, बहुतई हुसियार है . . . जब मोहल्ले का दूसरा बचवा तोतली भासा मे बोलना सीख रहे थे, ई, अपनी माई को सुन-सुन कर पूरा गायत्री मन्त्र बाँच लेती थी . . . "

" . . . पर किसन, यह इंग्लिश मीडियम स्कूल है, तुम उसे कैसे  पढ़ाओगे . . . होमवर्क आदि कैसे कराओगे?"

"आप वा की चिंता कोनो मत करो जी, मैं दुगुनी महनत करके उसके लिए टूसन लगा दूँगा . . . उसकी माँ भी और काम पकड़ लेगी।  . . . हम उसे पढ़ावे का काबिल नहीं तो क्या,  पढ़-लिखकर, वो तो हमें और अपने आने वाले बचवा को पढ़ा सकत है। मैडम जी, हम गरीबन का जीवन में, ऐसन अवसर बड़े भाग से मिलत है . . . "

दोनों भीगी पलकें लिए कमरे से बाहर निकले . . . .

मुनिया दाख़िला पत्र हाथ में लिए ख़ुशी से उछल रही थी . . . उसे मैडम जी ने नया नाम भी तो दिया था – गायत्री!

लोग  एक बार फिर से नाक मुँह सिकोड़ कर, काना फूसी करने लगे . . . 

"कैसे दिन आ गए हैं, अब हमारे बच्चे इन 'छोटे लोगों' के बच्चों के साथ पढ़ेंगे . . . !"

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंतर 
|

"बस यही तुम में और मनोज में अंतर है,…

टिप्पणियाँ

डॉ. शैलजा सक्सेना 2021/07/20 05:21 AM

बहुत अच्छी लघुकथा प्रीति! भविष्य की आस जगाती और प्रिंसिपल की संवेदनशीलता को मुनिया के नए नाम में दर्शाती। बहुत बधाई।

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता - क्षणिका

हास्य-व्यंग्य कविता

लघुकथा

कविता

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं