रंग बरस गया
कथा साहित्य | कहानी भगवती सक्सेना गौड़1 Apr 2025 (अंक: 274, प्रथम, 2025 में प्रकाशित)
एक इत्तिफ़ाक़ ही था, लिफ़्ट थोड़ी देर को रुक गयी थी। लगा कुछ ख़राबी आ गयी थी। अक्षत होली खेलकर वापस घर आ रहा था। चेहरा रंग से पुता था, दोस्तो ने थोड़ी सी भाँग ज़बरदस्ती पिला दी थी। चिल्ला पड़ा, “अरे किसने लिफ़्ट रोकी, मुझे बाइसवें फ़्लोर पर जाना है।” उसको बिल्कुल ध्यान नहीं था, लिफ़्ट में कोई और भी है। वह एक लड़की थी, शायद आँखों से देख नहीं पाती थी, गॉगल्स के साथ एक छड़ी भी थी।
बोली, “समझ में नहीं आ रहा क्या? लिफ़्ट में कुछ ख़राबी आयी है, थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी।”
“सॉरी, मैम, मुझे लगा मैं अकेला हूँ।”
अचानक रोली को लगा, ये आवाज़ तो वही लग रही, फिर उसने अपने को समझाया, ये हो ही नहीं सकता, कहाँ से अक्षत यहाँ आएगा, वह तो यूएस चला गया था।
लिफ़्ट चल पड़ी थी। दोनों अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे।
पर भाँग के चक्कर में भी अक्षत सोच में पड़ गया, कहीं तो सुनी है ये आवाज़।
घर आया तो बहन जीजाजी सब खाने पर इंतज़ार कर रहे थे। नहा कर सब डाइनिंग टेबल पर बैठे, होली पर चर्चा चल रही थी।
दीदी ने कहा, “इतने वर्षों बाद दिल्ली आए हो, इसलिए आज शाम को घर में होली पार्टी रखी है, कहीं जाना मत।”
शाम को बड़े से हॉल में होली के सब गाने बज रहे थे, लोग खाते-पीते डांस भी कर रहे थे। दीदी की सोसाइटी के भी लोग आए थे, कुछ रिश्तेदार भी थे।
अचानक पूरे होशो-हवास में अक्षत की नज़र रोली पर पड़ी, अभी भी वह छड़ी के सहारे ही चल रही थी।
अचरज से अक्षत उसको देखता ही रह गया, यादों में खो गया, कॉलेज के दिनों में जब दो वर्ष उसने रोली के साथ बिताए थे। कई मूवीज़ देखी थीं, बाग़ों में घूमे थे। और तीसरे वर्ष में ही उसके पापा का ट्रांसफ़र हो गया था। उसने उसे एक प्यारा-सा झुमका अंतिम बार मिलने पर दिया था।
वह चली गयी थी। दोनों ने प्रॉमिस किया था, पहले कैरियर सेट हो जाये, हम मिलेंगे ज़रूर।
पर हाथ की रेखाओं में क्या लिखा है, कब कौन जानता है?
उसके बाद दोनों मिल ही न पाए। आज इस मोड़ पर मुलाक़ात हुई, वह भी रोली देख नहीं पाती, ये अक्षत नहीं समझ पाया।
दीदी ने अक्षत का परिचय कराया, ये रोली है, एक स्कूल में टीचर है। इसके साथ एक हादसा हुआ और ये अब देख नहीं पाती।
नाम सुनकर दोनों एक दूसरे में खो गए।
अक्षत ने कहा, “मैंने तुमको बहुत ढूँढ़ने की कोशिश की, पर कामयाब न हो सका।”
रोली बोली, “कोई बात नहीं, मैं ही हादसे के बाद मिलना नहीं चाहती थी, दीवाली का पटाखा बीस वर्ष पहले मेरी ज़िन्दगी में अँधेरा कर गया। तुम्हारे दिए झुमके ने आज भी दिल को रोशन कर रखा है। मैं तो सुबह ही पहचान गयी थी, आवाज़ से, पर विश्वास नहीं हो रहा था, कि तुम मुझे इस जीवन में फिर मिलोगे।”
अक्षत बोले, “तुमको पता है, मैं चालीस वर्ष का हो चला हूँ, मम्मी-पापा बहुत दुखी हैं कि मैं शादी के लिए तैयार क्यों नहीं होता? अब लग रहा ये होली रंगों को मेरे सेहरे में सजायेगी।”
“क्या बात कर रहे हो, भूल जाओ, कोई अंधी लड़की से शादी करता है क्या?”
अक्षत ज़ोर से बोला, “दीदी गुलाल कहाँ है, मेरी तलाश पूरी हुई, मेरी ज़िन्दगी रोशन करने वाली मिल गयी।”
ज़ोर से गाते हुए . . . रंग बरसे भीगे चुनर वाली . . . और गुलाल से ही रोली की माँग भर दी, गाल गुलाबी कर दिए। सारे लोगो ने दोनों को बधाई दी। और अक्षत ने फोन पर मम्मी-पापा को बताया, जल्दी ही आपकी बहू लेकर घर आ रहा हूँ।
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