सड़क पर समय
काव्य साहित्य | कविता अरुण कुमार प्रसाद15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सड़क पर
समय और सड़क दोनों ही भाग रहे थे
बिना देखे पीछे, दायें या बायें
देख तो वह सामने भी नहीं रहा था।
बस रहा था भाग।
नींद में ही जाग।
समय में
सड़क और समय दोनों ही रहे थे तलाश
खोया हुआ अपना-अपना विश्वास।
किताबों की उधड़ी हुई जिल्दों में,
कहीं ख़्वाबों को पहले पढ़े हुए हर्फ़ों में।
आदमी बेतहाशा, समय में, सड़क पर।
बेतरतीब रखा हुआ अपना सिर धड़ पर।
भागता-दौड़ता जहाँ का तहाँ खड़ा।
पसीना-पसीना, परेशान गिरा-पड़ा।
क्योंकि, भागने का हुनर न समय, न सड़क के
पास है।
क्योंकि, आदमी वरदान के लिए भागता हुआ
बाँटने, अपने ही आस्तीनों में रखा हुआ शाप है।
सामूहिकता जार-बेजार है क्योंकि,
कुचल कर बढ़ जाने का प्रचलन है।
भविष्य क्योंकि, रंगहीन, गंधहीन, भावहीन है
बस उसे आकार देने तक का सारा जतन है।
लोग जो समय के साथ समय में भागते हैं
समय के व्यूह में हैं।
लोग जो सड़क के साथ सड़क पर दौड़ते हैं
सड़क के चौराहे पर हैं।
लोग अपने ज़ख़्म समय पर उतार देने को आतुर हैं।
लोग अपने आघात सड़क को मढ़ देने को तत्पर हैं।
राजपथों ने बहुत बार समय को नंगे पाँव दौड़ाया है।
समय-खणडों ने बार-बार राजपथों को तुड़वाया है।
समय और सड़क दोनों ही आचरणतः सच्चरित्र हैं।
पर,
सामाजिक विमर्शों को
कथा-कहानियाँ होने देने से रोकने के बजाय
हलाला सा मज़ा ले रहे हैं।
ये उलझे हैं आदमी सुलझाने में।
और आदमियत बिकवाने में।
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