समय
काव्य साहित्य | कविता अरुण कुमार प्रसाद15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
समय का गर्भ नहीं होता।
गर्भ धरने से समय लेता है जन्म।
तब समय को गर्भ जन्मता है।
समय सिर्फ़ सृजन से सापेक्ष है।
बाक़ी समय में समय निरपेक्ष है।
मन और तन इसका शून्य है।
किन्तु, जब हो तो सम्मान गुण्य है।
जीव के जीवन में समय, जन्म और मृत्यु।
किन्तु, जीवन के समय में कृति और कर्त्तव्य।
समय व्योम सा अपरिभाषित।
ब्रह्माण्ड सा आभासित।
जब ब्रह्माण्ड है तो समय है।
यही इसका परिचय है।
ईश्वर है समय की आध्यात्मिकता।
और
बुद्धिमान जन्तु इसकी वैज्ञानिकता।
समय शाश्वत है किन्तु, अप्रकट।
प्रत्येक कण में स्थित निष्कपट।
कण के प्रत्येक क्षण को समय ही जीता है।
समय नहीं है तो हर कण रीता है।
ब्रह्मांड दर ब्रह्माण्ड समय स्थिर है।
जड़, जीव के इकाई कण के स्पंदन से मापित
किसी गणित से निडर है।
केवल गति के चक्र से विभिन्न है ग्रहों में समय।
समीकरण खोजे व वैज्ञानिक बनाए इसे विषय।
समय सबका है।
किन्तु, किसीका नहीं है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अनुभूति
- अब करोगे क्या?
- अब रात बिखर ही जाने दो
- आओ सूर्य तुम्हारा हम स्वागत करें
- ईश्वर तूने हमें अति कठिन दिन दिये
- उदारवादिता
- उपहार
- एक संवाद
- ऐसे न काटो यार
- कृश-कृषक
- कैसे पुरुष हो यार - एक
- गाँधी को हक़ दे दो
- जग का पागलपन
- ज्योतिपात
- डर रह गया
- तरुणाई
- तिक्त मन
- तुम्हारा शीर्षक
- पाप, पुण्य
- पीढ़ियों का संवाद पीढ़ियों से
- पुराना साल–नया वर्ष
- पेंसिल
- पैमाना, दु:ख का
- प्रजातन्त्र जारी है
- प्रार्थना
- प्रेम
- फिर से गाँव
- मनुष्य की संरचना
- महान राष्ट्र
- मेरा कल! कैसा है रे तू
- मेरी अनलिखी कविताएँ
- मैं मज़दूर हूँ
- मैं वक़्त हूँ
- यहाँ गर्भ जनता है धर्म
- शहर मेरा अपना
- शान्ति की शपथ
- शाश्वत हो हमारा गणतन्त्र दिवस
- सड़क पर समय
- सनातन चिंतन
- सब्ज़ीवाली औरत
- समय
- ज़िन्दगी है रुदन
कविता - हाइकु
चिन्तन
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं