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कदमों की थाप

जीने पर चढ़ते भारी भरकम जूतों के कदमों की थाप सुनते ही कढ़ाई में चलती मेरे हाथ की कड़छुली वहीं रुक गई। मैं अपने ध्यान में काम में मस्त थी, किन्तु अब आगुन्तक को देखने को आँखें दरवाज़े की ओर लग गईं। जूतों की थाप बता रही थी कि कोई बहुत थका है या सोच में डूबा है, जिससे उसके कदम उठ नहीं पा रहे या फिर वो किसी ऊहापोह में डूबा है कि ऊपर जाऊँ कि नहीं। पहाड़ों के घर मिट्टी व लकड़ी के बने होते हैं।  लकड़ी के ज़ीने हर तरह के कदमों की थाप का राज़ खोल देते हैं। आगुन्तक के मन व सोच का आईना बन जाती है यह थाप। जहाँ बच्चों की भगदड़ एहसास दिलाती है कि वे अन्जाम से बेपरवाह बस जल्दी ही मंज़िल पाना चाहते हैं, वहीं ठहरे-ठहरे कदम, ध्यान से सीढ़ी चढ़ते व उतरते बुज़ुर्ग सँभल कर कदम रखते हैं कि कहीं टेढ़ी मेढ़ी सीढ़ियों पर पाँव न जमा.. तो गए नीचे।  लेकिन कदमों की थाप भारी पकड़ वाली होती है।  ऊपर आते हुए इन कदमों की थाप सबसे हट कर थी। कोई अन्जाना व्यक्ति हिचकता हुआ ऊपर आ रहा है, इतना तो आनेवाले की वायब्रेशन्स जो मुझ तक पहुँच पा रहीं थीं, वे बता रहीं थीं। कि, तभी गोद में एक सूखे से बच्चे को उठाए, दूसरे कंधे पर मैला-कुचैला झोला लटकाए एवम्‌ हाथ में डोरी से बँधी एक हाँड़ी लटकाए हुए एक गूजर औरत मेरे सामने आकर खड़ी हो गई। उसे देखते ही मैं समझ गई कि इसके दोनों हाथों का वज़न ही इसके वज़नी कदमों का कारण बन रहे थे।

स्वर को मृदुल बनाकर बडे ही मनुहार से वह अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी आँखों में देखती एकदम से बोली, “बिब्बी!” और मेरी ओर मुस्कुराते हुए प्रत्युत्तर की आशा में देखने लगी। वह आवाज़, वह मुस्कुराहट मेरे भीतर दूर-दूर तक जाकर उसे इस हाल में भी पहचान गई हठात मेरे मुँह से निकला, “रेशमा, हो न!”

“सियांणया नहीं मैनूं?“ (मुझे पहचाना नहीं क्या?) उसके चेहरे पर हक़ीक़त की रेखा खिंच गई लगी। उसने भाँप लिया था कि उसकी माली हालत के फलस्वरूप उसमें जो ज़मीन-आसमान का बदलाव आ गया था, वो बिब्बी को पता चल गया है। क्षण भर में उस मुस्कुराहट की जगह बेचारगी छलकने लगी थी। उसके स्वर की आद्रता ने मुझे बुरी तरह मथ दिया। मैंने चेहरे पर स्वागत भरे भाव लाते हुए उसे दिलासा देते हुए कहा कि वह कुड़ी (लड़की) से जनानी (औरत ) बन गई है इसीसे पहली नज़र में पहचान नहीं पाई।

कहाँ वो शर्मीली, यौवन से भरपूर, गुलाबी गालोंवाली कुछ वर्षों पहले की कश्मीरन! जो सिर पर चुनरी इस तरह करती कि चुनरी का एक हिस्सा दाहिनी ओर से दाँतों तले दबा लेती व होंठों से मंद-मंद मुस्कुराती रहती थी। सिर पर दूध की मटकी रखकर यूँ सीधी तनकर चलती कि हर देखनेवाला ‘हाय, क्या बात है’ कह उठता था। वह भी सब समझती थी, तभी इतराती थी। और कहाँ यह निचुडे नींबू सी पीली, हड्डिकयों का ढाँचा बन गई रेशमा!! उसकी मोटी- मोटी आँखें चंचल हिरनी सी हमेशा मेरे बच्चों को ढूँढतीं, उनको प्यार जताने के लिए वह उनका नाम लेती, झूठ-मूठ साथ चलने का आग्रह कती -फिर ही वो मटकी खाली करवाक�� वापिस जाती। उसका बाप कालिया गूजर हमें दूध-घी की किल्लत नहीं होने देता था। जबकि कश्मीर घाटी में पाऊडर के दूध का चलन है। वादी में पहाड़ों के दामन में बसे पहलगाम में सैलानियों के आने के कारण अच्छा खासा बाज़ार भी है। रेशमा कभी-कभी दूध का बर्तन वहीं छोड़कर यह कहकर भाग जाती कि हाट करके वापसी में बर्तन ले जाएगी। लौटते हुए अपने आने का एहसास कराए बिना वो जाती नहीं थी। क्यूँकि मैं उसे बची-खुची साग-सब्जी, मिठाई, पुराने कपड़े इत्यादि दे देती थी। यह सिलसिला टूटा १९८९ में, जब कश्मीर में उग्रवाद ने अपना आँचल फैलाया। इससे सब तितर-बितर हो गए। दोबारा १९९६ में जब बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शनों को श्रद्धालु उमड़ पड़े तो हम मौसमी लोग भी अपने छूटे हुए घोंसलों में पुनर्स्थापित होने का साहस जुटा पाए। इसी तरह कश्मीरी गुज्जर लोग भी जो न जाने किन जंगलों में इस दौरान खोए रहे, उन्होंने भी अपने पुराने ठिकानों का रुख किया। इसी कारण रेशमा भी आ गई। लेकिन उस रेशमा व इस रेशमा में कहीं कुछ मेल नहीं खा रहा था। इस बीच वो लगातार बहुत कुछ यानि अपनी आत्मबीती सुना रही थी। अपना काम खत्म कर मैं तसल्ली से उसके पास आकर बैठ गई, व उससे पूछा, “तेरा गबरू करता क्या है?”

बोली, “जंगलूँ लक्कड़ कट्के थल्ले होटल इच देसी। ढोर-डंगर वी हे, जमीं च मक्की वी होए हे। ऍ तेरे लई अपणी गाई दा घ्यो सारी स्याल बणाया हे। ” (जंगल से लकड़ी काटकर, यहाँ नीचे एक होटल में देता है। मेरे पास ज़मीन व जानवर भी है। तेरे लिए अपनी गाय का घी सारी सर्दियाँ बनाती रही) यह कहकर उसने अपने हाथ में लाई मटकी मेरे सामने रख दी। जितनी देर वो बोल रही थी, उसका नवजात शिशु उसकी कमीज़ के गले से , जिसके ऊपर से लेकर नीचे तक सारे बटन खुले थे, उसके लटके सूखे स्तनों को बाहर निकालकर कभी दूध पी रहा था तो कभी उनसे खेल रहा था। रेशमा जैसे इस सब की आदी हो इसीसे इस सबसे बेख़बर बस अपना अफ़साना सुनाए जा रही थी।

मैं सोच रही थी कि दुपट्टे से अपना मुँह-सिर ढँक लेने वाली रेशमा आज अपनी खुली छाती से बेपरवाह बैठी थी। वह स्वयं तो कमज़ोर व पीली लग ही रही थी, उसका बेटा भी सूखे के रोग से पीड़ित लग रहा था। न जाने इन सूखी छातियों में उसके बच्चे को कुछ मिलता भी था या फिर केवल चूसने का संतोष ही था।

“बिब्बी! ऍ कलाड़ी वी न्याणे खासी”, यह कहते हुए उसने कलाड़ियाँ (पनीर की कच्ची रोटियाँ) जो पहाड़ों पर सौग़ात समझी जाती हैं, एक पोटली में से न्याणों (बच्चों) के खाने के लिए बाहर निकालीं। ग़ाय का ज़र्द पीला ख़ालिस घी एवम्‌ पनीर की कलाड़ियाँ, देखकर मेरी तो बाँछें खिल गईं। मैंने पूछा कि कितने रुपये हुए। तो वह झिझकती हुई बोली, “डेढ़ सो ते देगी ना!” सुनते ही मुझे कुछ कचोट सा गया। मैं सोचने लगी कि किन मुश्किलों से उसने एक-एक दिन मेहनत व बचत करके अपने व अपने बच्चे के मुँह से दूध छीनकर यह घी बनाया होगा। सिर्फ़ इस आस में कि…..मात्र डेढ़ सौ रुपये…….नहीं-नहीं यह तो ठीक नहीं। उसकी मासूमियत पर मेरी आँखें उसके प्रति स्नेह से भर उठीं। शीतकालीन सर्द हवाओं से बचाकर जो आस का दीपक उसने जलाए रखा था, उसके प्रकाश से मेरा अन्तर आलोकित हो उठा था। उस प्रकाश से निकलती आस व उम्मीदों की किरणें मुझ तक पहुँच पा रही थीं।  रेशमा की मनःस्थिती मेरे सम्मुख स्पष्ट थी। उसकी प्रतीक्षातुर प्रत्याशा मैं महसूस कर रही थी।

उसकी शादी का शगुन, उसके बेटे का शगुन और उसके द्वारा लाई गई चीज़ों के पैसे व कुछ और सामान भी उसे दे कर मैंने उसकी पीठ पर स्नेह से हाथ फेरा। लगा मैंने उस आस के दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया। वो आत्म-विश्वास से भरी, मुस्कुराते हुए, कृतज्ञता के भाव ओढ़े जा रही थी। वही रबर के भारी- भरकम बूट अब जीने से फटाफट उतर रहे थे।  लगता था…..इन कदमों की थाप में खुशी से भरकर उड़ने की उमंग थी।

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