चला गधा आदमी बनने
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
ऑफ़िस जाते-जाते भले ही लंच ले जाना भूल जाऊँ तो भूल जाऊँ, पर मंदिर के पास से जाना नहीं भूलता। आप सोच रहे होंगे कि मैं मंदिर से होकर जाते हुए भगवान के दर्शन करता जाता होऊँगा ताकि मेरा ऑफ़िस में दिन शुभ निकले। अगर आप ये सोच रहे हैं तो ग़लत नहीं, बिल्कुल ग़लत सोच रहे हैं। मेरे ही नहीं, हर चमचे के भगवान, मंदिर में नहीं, ऑफ़िस में बैठते हैं। और मैं रोज़ ताज़े फूल मंदिर के पास से ले जाता हूँ उनके श्री चरणों में अर्पित करने के लिए। लंच में बासी चपातियाँ हों तो चलेंगी। लंच में बासी सब्ज़ी हो तो वह भी चलेगी। पर साहब के श्री चरणों के लिए बासी फूल बिल्कुल नहीं चलेंगे। यह मेरा नित्य कर्म है। होंगे जिनके लिए धर्म दूसरे होंगे। मेरे लिए तो यही परमो धर्म है। और मैं इस कर्म में तब तक संलिप्त रहूँगा जब तक मैं सीना तान कर सेवानिवृत्त न हो जाऊँ।
ऑफ़िस में दिन शुभ भगवान के दर्शन करने से नहीं, साहब के दर्शन करने से होता है। ऑफ़िस में दिन शुभ भगवान के चरणों में फूल चढ़ाने से नहीं, साहब के चरणों में फूल चढ़ाने से होता है। अगर साहब प्रसन्न तो दिन शुभ मानिए। शर्तिया। सुबह ऑफ़िस में जाते ही साहब आपको देखकर मुस्कुरा गए तो आपका दिन शुभ होने से कोई नहीं रोक सकता।
सो रोज़ की तरह आज भी मैं जैसे ही ऑफ़िस जाने के बहाने मंदिर के पास से मुरझाए चेहरे वाली से चार ताज़े फूल लेने को हुआ कि मंदिर के द्वार पर मुझे एक गधा अपनी अगली दो टाँगें जोड़े दिखा तो विस्मय हुआ। अब गधे भी भगवान की शरण में जाने लगे?
ख़ैर! मामला संगीन नहीं, बहुत संगीन था, सो गधे के पीछे चुपचाप खड़ा हो गया आँखें बंद किए कान खोले। गधा अपनी दोनों आँखें बंद किए पूरे भक्तिभाव से भगवान की मूरत के आगे अपनी अगली दोनों टाँगों के हाथ बनाए जोड़े पिछली टाँगों पर भक्तासन में पूरी ईमानदारी से खड़ा था किसी समर्पित भक्त की मुद्रा में।
वह अपनी आगे की दोनों टाँगें जोड़ भगवान की मूरत के आगे बुदबुदा रहा था, “हे प्रभु! गधा बनकर इस समाज में आज तक बहुत जिया। गधा समझ इस समाज ने मेरा क़दम-क़दम पर बहुत यूज़ किया। आज मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह झूठ बोलने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर आज तक इस समाज में बहुत जिया। गधा समझ इस समाज ने मेरा बहुत यूज़ किया। आज मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह धोखा देने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस समाज में बहुत जिया। गधा समझ इस समाज ने मेरा आज तक बहुत यूज़ किया। आज मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह अपनों की पीठ में हँसते हुए छुरा घोपने की ताक़त दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस समाज में बहुत जिया। गधा समझ इस समाज ने मेरा आज तक बहुत यूज़ किया। आज मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह ईमानदारी से बदतमीज़ी करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह अहंकार दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह सब कुछ होने के बाद भी आठ पहर चौबीस घंटे असंतोष दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह कूट-कूट कर ईर्ष्या दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जी जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने आज तक क़दम-क़दम पर बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह क्रोध करने की असीम शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह लोभ वहन करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह सच पर भी शक करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह दोनों हाथों से भर भरकर द्वेष दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह पर निंदा करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे पर आदमी की तरह लालच करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर आज तक बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह पूरे आत्मविश्वास से विश्वासघात करने की शक्ति दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! गधा बनकर इस संसार में बहुत जिया। गधा समझ मेरा इस समाज ने क़दम-क़दम पर बहुत यूज़ किया। मुझे और कुछ दे या न दे, पर आदमी की तरह भर भर कर नेगेटिविटी दे ताकि मैं गधे से आदमी हो सिर उठा कर गर्व से जिऊँ।
“हे प्रभु! हे प्रभु . . .” गधा था कि भगवान के सामने जनता की तरह डिमांडें रखने से रुक ही नहीं रहा था। गधा कहीं का! इससे पहले कि उसकी डिमांडों को सुन मैं आदमी से गधा हो जाता, मैंने साहब के श्री चरणों के लिए ताज़े फूल बिन मोल भाव किए लिए और ऑफ़िस में साहब की पूजा करने निकल पड़ा।
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