एक सौभाग्यशाली बीवी के पति की मृत्युकथा
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी डॉ. अशोक गौतम15 Jan 2026 (अंक: 292, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
सच मानिए! गंद में रहकर, गंदा पानी पीकर, गंदा-फँदा खाकर मरने से पहले तक जितना भी जिया हूँ, ठाठ से जिया हूँ। बाज़ार से प्योर के नाम पर गंद-फंद खाकर क्या मजाल जो कभी मुझे खाँसी ज़ुकाम भी हुआ हो। गंद-फंद खाकर उल्टियाँ उन्हें लगती हैं, जो शुद्ध खाते रहे हों। गंद-फंद खाकर दस्त उन्हें लगते हैं, जो शुद्ध खाते रहे हों। गंद-फंद खाकर लिवर उनका ख़राब होता है जो शुद्ध खाते रहे हों। गंद-फंद खाकर हार्ट फ़ेल उनके होते हैं जो शुद्ध खाते रहे हों। गंद-फंद खाकर किडनियाँ ख़राब उनकी होती रही हैं जो शुद्ध खाते रहे हों। यहाँ तो भाई साहब! जिस दिन पैदा हुआ था, उसी दिन पहला चमच गंदगी का मुँह में डाल दिया गया था ताकि हर क़िस्म की गंदगी में रहने, खाने से ख़ुश्बू का आनंद लूँ।
तो जनाब! कल अचानक हुआ यों कि मुझ देश के सबसे स्वच्छ शहर के स्थायी नागरिक ने नल से रोज़ की तरह पानी पिया। पानी पीते ही अचानक मुझे पहले तो उल्टियाँ लगीं, फिर दस्त और उसके बाद एकाएक डिहाईड्रेशन और फिर बुख़ार हो गया। एक भी बीमारी कभी मेरे पास नहीं फटकी। उल्टा मैं ही जब भी फटका, बीमारियों के पास फटका। पहली बार इतनी बीमरियों से एक साथ घिरा था। अजीब लग रहा था। जितने को मेरे घरवालों से पहले मैं सँभलता, मैं मर गया। तब मुझे लगा, हो न हो, ये सब ग़लती से नल में शुद्ध जल आने से हो गया हो गया होगा।
असल में बंधुओ! मैं दूषित सब्ज़ियाँ, सड़े आटा-दाल खाकर, दूषित पानी पीकर, दूषित वायु में साँस लेकर मज़े से जीता रहा हूँ।
इधर मैं पानी पीकर मरा तो उधर सोशल मीडिया जागा। बहुधा मीडिया और सरकार जनता के मरने पर ही जागते हैं। अजीब व्यवस्था है ये भी जनाब! जो आम आदमी के ज़िन्दा रहते उसके ज़िन्दा रहने के कारणों की कभी जाँच नहीं करती वह उसी आम आदमी के अपनी ग़लती से अचानक मरने पर एकदम उसके मरने के कारणों की जाँच करने में जुट जाती है। सरकार ने मेरी बॉडी की जाँच की गई तो पता चला मैं दूषित पानी पीने से मर गया। सरकार ने दूषित पानी पीने से मरने पर मेरे माँगने से पहले मेरे परिजनों को दो लाख रुपए देने की सहर्ष घोषणा की तो वे पागल हो उठे। आह री सरकार! अजब सिस्टम है तेरा भी! दूषित जल पीने से मरा मैं और दो लाख मेरे परिजनों को। मुझे मरने के बदले क्या मिला? ठेंगा।
काश! इन दो लाख में से समय रहते जो कुछ से शुद्ध जल जो सरकार मेरे नल में समय रहते भेज देती तो शायद मैं कुछ महीने साल और जी लेता। ख़ैर, आज नहीं तो कल, गंदे हालों से हारकर ज़रूर मरता। लोकराज में बकरे की माँ और जनता आख़िर कब तक ख़ैर मनाएगी?
देखते ही देखते मेरे परिजन मेरी लाश ठिकाने के बदले दो लाख के लिए सरकार के आगे-पीछे चक्कर लगाने लगे। वे ख़ुश थे कि बंदा मरते मरने पर ही सही, दो लाख दे गया। ज़िन्दा रहता तो हरदम नाक में दम किए रखता। सरकार द्वारा मेरे मरने पर दो लाख देने की घोषणा हुई तो मैंने अपनी बीवी से ठहाका लगाते कहा, “देखा न पगली! सारी उम्र तू मुझे गालियाँ देती थी कि काम का न काज का, दुश्मन अनाज का! मरने के बाद ही सही, हुआ न पूरे दो लाख का! ऐसे पति बहुत कम पत्नियों को नसीब होते हैं पगली! तू बहुत सौभाग्यशाली है। ऐसे पति तुम जैसी बवियों को बहुत नसीब से मिलते हैं जो साधारण मौत नहीं मुआवज़े की मौत मरते हैं। वाह! क्या कमाल की सुव्यवस्था है हमारी भी! ज़िन्दगी के लिए कुछ नहीं और जो व्यवस्था की ख़ामियों से कोई मरे तो अपनी ख़ामियों को ख़रीदने के लिए मुस्कुराते हुए मरे के परिजनो के हाथों फोटो खिंचवाते पकड़ा दिया ज़िन्दगी के मुआवज़े का चेक। अब ऐसा करना कि जब सरकार मेरे मरने पर दो लाख दे तो सबसे पहले घर में आरओ लगवा लेना। अपने महल्ले का पानी अब अपनी बरदाश्त करने की हद से अधिक गंदा हो गया है। लगता है, अपना शहर जैसे जैसे स्वच्छ होता जा रहा है, यहाँ के हवा पानी वैसे वैसे अफ़सरों की तरह गंदे होते जा रहे हैं।
अब बची बाक़ी पैसों की बात! उन्हें अपने खाते में जमा करवा लेना। मेरा क्रिया कर्म करने के चक्कर में मत पड़ना। जो सारी उम्र इसकी उसकी हरकतों से अशांत रहा हो, उसके मरने पर उसकी आत्मा की शान्ति के लिए पूजा पाठ करवा ख़ाक शान्ति मिलेगी? अच्छा, अब चलता हूँ। गंदे माहौल में अपना ख़्याल रखना, “मैंने अपने मरने के बाद भी अपना फ़र्ज़ निभाते बीवी को बेकार की हिदायतें दीं और अपने घरवालों से श्रद्धांजलियाँ ले आगे हो लिया। जानता हूँ, जिस बीवी ने मेरे ज़िन्दा रहते की नहीं मानी, वह मेरे मरने के बाद मेरी क्या ख़ाक मानेगी? मेरे मरने पर हाथ पर दो लाख आने की ख़ुशी में बीवी ने मुझे हँसते हुए विदा किया तो मेरा बीवी से अलग होने का ग़म जाता रहा। उसने मुझे सी ऑफ़ करते कहा कि जैसे ही कमेटी से मेरे मरने का प्रमाणपत्र जारी होगा, वह मुझे व्हाट्सएप कर देगी।
हिंदू था सो मैं यमराज के पास गया! मुसलमान होता तो मरने के बाद वहाँ जाता जहाँ मुसलमान जाते हैं। ईसाई होता तो मरने के बाद वहाँ जाता जहाँ ईसाई जाते हैं। कुछ और होता तो मरने के बाद वहाँ जाता जहाँ मरने के बाद और जाते हैं। ज़िन्दा रहते भले ही सब यहाँ एक दूसरे के साथ रहते एक दूसरे से लड़ते रहें, पर मरने के बाद सबके पता नहीं क्यों अलग-अलग ठिकाने हैं? ज़िन्दा एक साथ रहने से कठिन शायद मरने के बाद एक साथ रहना होता होगा।
ज्यों ही मैं यमराज के दरबार में पहुँचा तो यमराज मुझे सिर से पाँव तक निरखने-परखने के बाद बोले, “वेलकम डियर! स्वागत है। बाक़ी दस कहाँ हैं?”
“होंगे कहाँ जनाब! आ रहे होंगे घर में बचों के लिए आटा-दाल छोड़़कर बाज़ार से। पर जनाब को कैसे पता चला कि मैं आ रहा हूँ?”
“फ़ेसबुक पर तुम्हें टकाटक दी जाने वाली श्रद्धांजलियों से तुम्हारे मरने के बारे में पता चल गया था दोस्त! मान गए यार! ग़ज़ब के शुभचिंतक हैं तुम्हारे भी! तुम्हारे मरते ही उन्होंने श्रद्धांजलियों की बौछार तुम पर यों लगा दी ज्यों बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब मरा है . . . तो अबके कैसे मरे? महँगाई का जश्न मनाते ज़हरीली दारू पीने से मरे होगे?”
“नहीं जनाब! दारू तो अपने राज्य में कभी की बैन है,” मैंने कहा तो वे ठठाकर बोले, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी ख़ासियत है कि वहाँ जो बैन होता है, वही धड़ल्ले से बिकता है। तो खा ली होगी किसी बीमारी में किसी कमीशन वाले डॉक्टर की उल्टी सीधी दवा?”
“नहीं जनाब! अब देश की जनता का इम्यून सिस्टम इतना मज़बूत हो गया है कि हर टाइप की बीमारियाँ अपने यहाँ पानी भरती हैं,” मैंने मरने के बाद भी मुस्कुराकर सच कहा तो उन्होंने चित्रगुप्त की उँगली दाँतों तले दबा ली।
“तो फिर कैसे मरे? दूषित हवा में साँस लेने से मरे होगे? अब तो सारा साल ही तुम्हारे वहाँ की हवा का क्वालिटी स्तर बहुत ख़राब रहने लगा है,” यमराज ने मेरी ओर हैरानी की नज़रों से देखे पूछा तो मैंने फिर मुस्कुराते कहा। वक़्त मिलते बाहर से ही सही, दूसरों को परेशान करने के लिए जी भर मुस्कुरा लेना चाहिए। अंदर की पीड़ा तो हँसने वाले को ही मालूम होती है, “जनाब! अब तो हमें गंदी हवा में साँस लेकर ही चैन मिलता है। जिस हवा में बदबू न हो, उसमें साँस लेना हमें रास ही नहीं आता।”
“तो फिर कैसे मरे?” यमराज असमंजस में! मज़ा आ गया।
“गुस्ताख़ी माफ़ हो तो पानी पीने से जनाब!” मैंने मुस्कुराते कहा तो वे हँसे! जी भर हँसे! बड़ी देर तक हँसने के बाद उन्होंने अपनी हँसी रोकते हुए पूछा, “अजीब बंदे हो तुम भी यार! यहाँ पानी मरते को भी ज़िन्दा कर देता है और एक तुम हो कि . . .”
“हाँ जनाब! सच मानिए! मैं पानी पीने से ही मरा हूँ। पता नहीं क्या हुआ कि कल जब मैंने ज्यों ही पानी पिया कि पहली बार पानी पीते ही मुझे उल्टियाँ लगीं। अभी उल्टियों से सँभला नहीं था कि दस्त लग गए। मैंने सोचा, चलो, इस बहाने पेट साफ़ हो जाएगा। पर पेट साफ़ होने के चक्कर में जितने को घरवालों से पहले मैं सँभलता मैं ही साफ़ हो गया।”
“देखो, तुम्हारी व्यस्था का सब कुछ हज़म हो रहा है, पर तुम्हारी ये बात हज़म नहीं हो रही,” उन्होंने अपने पेट को मलते कहा तो मैंने झट से अपनी जेब से एक हाजमोले की गोली निकाली और उन्हें देते कहा, “ये लीजिए हाजमोला सर! नामचीन कंपनी का हाजमोला है। इसे विज्ञापन में बड़े-बड़े फ़िल्मी स्टार खाते हैं। बड़े-बड़े पेटों का हाज़मा ठीक करने की ताक़त रखती है ये एक गोली। पानी पीने के बाद पता चला कि पानी गंदा था, पीया और मर गया।”
“तुम्हारे देश में अब पानी भी गंदा? वहाँ कुछ शुद्ध भी है क्या? जहाँ देखो, हवा गंदी, जहाँ देखो, पानी गंदा। जहाँ देखो, आटा-दाल गंदे। जहाँ देखो, व्यवस्था गंदी। ऐसे गंदे माहौल में आख़िर तुम रह कैसे रहे थे यार?”
“है जनाब! वहाँ बेईमानी शुद्ध है। वहाँ धोखा शुद्ध है। वहाँ झूठ शुद्ध है। वहाँ धर्म की दुश्मनी शुद्ध है। वहाँ चरित्रहीनता शुद्ध है। वहाँ . . . जनाब! सच पूछो तो गंदगी अब हमारी ज़िन्दगी के डीएनए में मिल गई है। अब तो जिस दिन गंदगी मिली चीज़ें खाने को न मिलें उस दिन हम बीमार हो जाएँ। जनाब! गला सूखा जा रहा है। एक गिलास पानी मिलेगा क्या?” मेरे कहते ही वे मेरा मुँह देखने लगे, पता नहीं क्यों?
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