अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

गृहलक्ष्मी

 

उस घर में आज की सुबह पहले जैसी नज़र नहीं आ रही थी। कल तक पचपन वर्षीया जानकी जी सुबह छह बजे उठकर परिवार के लिए चाय बनाती थी। सात बजे उनकी उन्नीस वर्षीया बेटी ऊर्मि उनके साथ किचन में नाश्ते के लिए आटा गूँधने के बाद सब्ज़ी काटती थी। इस बीच जानकी जी चाय के कप-प्लेट धो-पोंछ कर एक ओर रख देती थी। उधर इस दौरान उनके पति गंगा प्रसाद जी चाय पीकर बरामदे में झाड़ू लगाकर अख़बार पढ़ने लगते थे। चाय पीने के बाद उनका बेटा अशोक छत पर गमलों में पौधों को पानी देने के बाद रजाइयों और तकियों को सलीक़े से वापस उस बड़े संदूक के हवाले कर देता था जिसे वह वर्षों से बड़े कमरे के उस कोने में देखता आया है। ख़ैर, आज गंगा प्रसाद जी सीधे अख़बार पढ़ने लगे थे और जानकी जी स्नान कर रही थी। ऊर्मि सोयी हुई थी और अशोक छत पर पौधों को पानी देने के बजाय बालों में
कंघी कर रहा था। 

दरअसल, कल तक ये सब जो भी घरेलू काम करते थे, आज से इन सबकी छुट्टी क्योंकि दो दिन पहले अशोक का विवाह जिस लड़की शोभा से हुआ, आज से ये सभी काम उसी गृहलक्ष्मी को करने हैं। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अँगूठे की छाप
|

सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया। परेशान थी। घण्टा-भर…

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

आप-बीती

कविता - हाइकु

स्मृति लेख

चिन्तन

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

व्यक्ति चित्र

कविता-मुक्तक

साहित्यिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं