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धर्म एवं जीवन प्रबंधन

वर्तमान समय में धर्म को लेकर अनेक प्रकार की चर्चाएँ सुनने को मिलती हैं। धर्म के वास्तविक स्वरूप को जाने बिना भ्रांतिपूर्ण विचारों के कारण धर्म की जो व्याख्या अनेक स्थानों पर मिल जाती है उसके कारण अशांति और असंतोष ही अधिक पनपे हैं। वास्तव में धर्म एक व्यापक जीवन दृष्टि है जिसके अभाव में व्यवस्थित एवं सार्थक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि संकीर्णतापूर्ण सोच के दायरे से बाहर निकलकर धर्म को उसके वास्तविक अर्थ में ग्रहण किया जाए तथा उसे उसकी संपूर्ण समग्रता के साथ जीवन में उतारा जाए। 

जीवन विधाता की एक अनुपम अनुकृति है। जीवन की सार्थकता तभी है जब सकारात्मक तरीक़े से इसका सही नियोजन किया जाए। वैसे तो सृष्टि में अनेक प्रकार के जीवधारियों का अस्तित्व है किंतु बुद्धि और विवेक का वरदान प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही दिया है जिसके बल पर वह जीवन को उसकी सही अर्थवत्ता प्रदान कर सकता है। मनुष्य को यह भी अधिकार प्राप्त है कि वह अपने द्वारा किए गए कर्मों का चयन भी स्वयं करे। कर्म के चुनाव की यही स्वतंत्रता मनुष्य के द्वारा चुने गए कर्म के अनुसार उसके परिणाम तक पहुँचती है जो मनुष्य के जीवन का स्वरूप निर्धारित करती है, इसीलिए श्रेष्ठ जीवन की प्रतिष्ठा करने के आकांक्षी मनुष्य कर्मों की श्रेष्ठता पर विशेष बल देते हैं। 

श्रेष्ठ कर्म किए जाते रहें इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि मानव जीवन का एक श्रेष्ठतम लक्ष्य निर्धारित हो। और इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव है जब जीवन का बेहतर प्रबंधन किया जाए। जीवन प्रबंधन अर्थात उचित मानव जीवन जीने के लिए योजनाबद्ध जीवन शैली का विकास। किंतु प्रश्न यह उठता है की योजनाबद्ध जीवन शैली कैसे विकसित की जाए? इस प्रश्न का उत्तर हमें पौराणिक ग्रंथों एवं शास्त्रों में यदा-कदा मिल ही जाता है। शास्त्रों में मानव जीवन की समग्रता के विकास के लिए धर्म की स्थापना और प्रतिष्ठा पर बल दिया गया है। इसीलिए हमारे शास्त्र, हमारे ग्रंथ सांस्कृतिक दस्तावेज़ कहे जा सकते हैं, जिनसे निरंतर मार्गदर्शन हमें प्राप्त हो सकता है। धर्मानुकूल आचरण को ही मानव जीवन में प्रतिष्ठित कर जीवन जीने की प्रेरणा महापुरुषों ने भी अपने उपदेशों में दी है। वास्तव में धर्म मानव के लिए निर्धारित कर्तव्य कर्म से अनुप्राणित होता है। वह कर्तव्य जो मानव के लिए निर्धारित किए गये हैं। असल में धर्म का अर्थ ही है जीवन में स्वयं के अनुशासन के लिए स्वीकृति। हालाँकि इस मार्ग पर चलना साहस का काम है और साहस का काम इसलिए क्योंकि यह पथ साधना मूलक होने के कारण कुछ कठिन अवश्य प्रतीत होता है किंतु नामुमकिन नहीं, क्योंकि धर्म तो मानव जीवन के लिए एक मार्गदर्शिका है, एक पथ प्रदर्शक है जो धारणा की मूल प्रवृत्ति पर आधारित है। 'धारणा' अर्थात जिसकी स्वीकृति हो, जो धारण करने योग्य हो, वही धर्म है।    

विडंबना है कि धर्म को बाद में जातिगत विचारधाराओं के साथ जोड़कर देखा जाने लगा किंतु इसे मनुष्य का केवल मतिभ्रम कहा जा सकता है क्योंकि जब किसी तत्व का वास्तविक ज्ञान हमें नहीं होता है तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो ही जाती है। इस वैचारिक संकट से बचने के लिए "धार्यते इति धर्म:" के सिद्धांत को जानने-समझने की आवश्यकता है। संतों ने बार-बार उपदेश के माध्यम से धर्म की महत्ता और उपयोगिता को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। उन्होंने बार-बार सचेत करने की कोशिश की है कि जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। किंतु पुन: प्रश्न उठता है कि आख़िर धारण करने योग्य है क्या? वास्तव में नैतिकता, मर्यादा, कर्तव्य-निष्ठा, उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए त्याग की भावना, सामाजिक सरोकार, प्राणी मात्र के प्रति संवेदना और वे समस्त सद्गुण जो सही मायने में मानवीय भाव भूमि को स्थापित करने के लिए धारण किए जाते हैं, वही धर्म हैं। धर्म से जुड़कर ही मानवीय कर्म सत्य, शिव एवं सुंदर की सृष्टि करते हैं। धर्मानुकूल आचरण से प्रेरित होकर किए गए कर्म ही मनुष्य को वंदनीय बनाते हैं।

इस तथ्य के प्रमाण स्वरूप रामायण में वर्णित कतिपय प्रसंग यहाँ  उल्लेखनीय हैं। प्रथम तो भरत जी का उदाहरण सर्वोपरि है जो भातृप्रेम के पर्याय के रूप में जाने जाते हैं। किंतु क्या उनका प्रेम मात्र भातृ प्रेम ही था शायद नहीं क्योंकि भरत स्वयं धर्म स्वरूप कहे गए हैं, जिनके लिए धर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं। इसीलिए उनकी श्रद्धा, उनका अनन्य प्रेम बड़े भाई से अधिक धर्मावतार श्रीराम के लिए था जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए जीवन के हर संकट को सहर्ष स्वीकार किया। इतना ही नहीं राम वनवास का वास्तविक कारण ज्ञात होने पर उन्होंने अपनी जन्मदायिनी माँ से भी मुख मोड़ लिया क्योंकि जो कुछ हुआ अथवा किया गया, उनकी दृष्टि में वह धर्म के अनुकूल नहीं था। राम एवं भरत दोनों ने मर्यादा की प्रतिष्ठा और नैतिक कर्तव्य के परिपालन के पथ पर कभी कोई समझौता नहीं किया, इसीलिए उनका चरित्र आज भी मानव समाज के लिए अनुकरणीय है। एक अन्य प्रसंग में बालि द्वारा श्रीराम से पूछे जाने पर कि धर्म की रक्षा के लिए अवतरित होने के बावजूद उसे छुपकर मारने के पीछे आख़िर क्या प्रयोजन है–

धर्म हित अवतरेहु गोसाई।
मारेहूं मोहि व्याघ की नाईं॥
मैं बैरी, सुग्रीव पियारा।
अवगुण कवन नाथ मोहि मारा॥

तुलसीदास जी ने बालि की शंका का समाधान करते हुए श्रीराम के माध्यम से उल्लेखित किया है–

अनुजबधू भगिनी सुत नारी।
सुनु सठ कन्या सम यह चारी॥
इन्हहीं कुदृष्टि बिलोकहिं जोई।
ताहि बधे कछु पाप न होई॥

बालि का अवगुण तो सिर्फ़ यही था कि वह धर्म मार्ग से भटक गया था। स्पष्ट है कि धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी शस्त्र उठाना भी धर्म सम्मत ही होता है क्योंकि उस समय यही मानव का धर्म है। द्वापर युग में मानवीय कर्तव्यों के प्रति विरोधाभास की जो स्थिति दिखाई देती है उसके कारण चौतरफ़ा अधर्म  का ही वातावरण निर्मित हुआ। अधर्म अर्थात वे कर्म जो मानव के लिए धारण करने योग्य नहीं हैं, स्वीकार करने योग्य नहीं है। इसीलिए अधर्म को कभी प्रकृतिगत स्वीकृति मिल ही नहीं सकती। यही कारण है कि धर्म की स्थापना के लिए ईश्वरीय शक्तियाँ बार-बार धरती पर अवतरित होती हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने स्वयं उद्घोष किया है, जो आज भी मानव को सचेत करता हुआ प्रतीत होता है–  

यदा यदा ही अधर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:,
अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

मनु स्मृति के 8वें अध्याय में उल्लेखित 15वें श्लोक की चर्चा यहाँ आवश्यक है। इस श्लोक में धर्म का सार निहित है। विद्वानों के अनुसार सर विलियम जोन्स के द्वारा 1776 में इस श्लोक के अंग्रेज़ी में अनुवाद किए जाने संबंधी जानकारी भी मिलती है। इतना ही नहीं यह भी जानकारी मिलती है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा हिंदू क़ानून बनाने के लिए इस श्लोक का आधार ग्रहण किया गया था। वह पूरा श्लोक इस प्रकार है–

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोवधीत॥

अर्थात जो लोग धर्म की रक्षा करते हैं उनकी रक्षा स्वयं हो जाती है। धर्म का आशय ही है व्यक्ति के अपने कर्तव्य, नैतिक नियम, आचरण, चरित्र, सकारात्मक सोच आदि। जो व्यक्ति जीवन में इन गुणों का पालन करता है वह धर्म की रक्षा करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति कभी भटकता नहीं, कभी दिग्भ्रमित नहीं होता। अपने उत्तम आचरण से वह उचित मार्ग का अनुसरण कर ही लेता है। इस प्रकार धर्म व्यक्ति की रक्षा करता है। 

मनुष्य का जीवन उसके आचरण एवं चरित्र का दर्पण होता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह इस दर्पण पर अधर्म अर्थात न करने योग्य कार्यों की धूल न जमने दे। इसके लिए आवश्यक है कि वह सतत अपने कर्मों, अपनी सोच और अपने आचरण पर निगरानी रखे। मनुष्य अपने बाह्य एवं आभ्यान्तरिक स्तर पर धर्म के अनुकूल जीवन दृष्टि को विकसित करने का प्रयास करे। इसके लिए किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। छोटे-छोटे प्रयास तब तक किए जाते रहें जब तक वह हमारी आदत नहीं बन जाते। प्रबंधन का अर्थ ही है उथल-पुथल की स्थिति से निकलकर व्यवस्था पूर्ण शैली का विकास करना। जीवन में उन्हीं मानवोचित गुणों को धारण करना जिनसे मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सके, यही धर्म का मार्ग है और यही जीवन प्रबंधन का भी श्रेष्ठ मार्ग है। जीवन में सौंदर्य दृष्टि का पर्याय भी यही है। मानव का यही मार्ग समाज कल्याण का पथ प्रशस्त करता है इसी भावना के बल पर विश्वकल्याण की सोच को बल मिलता है।

मुझे एक संदर्भित पंक्ति याद आ रही है जो मैंने किसी संत से सुना था–

धर्म न हिंदू, बुद्ध है, 
सिख न मुस्लिम, जैन।
धर्म चित्त की शुद्धता 
धर्म शांति, सुख, चैन॥
 

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