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लौट कहाँ पाये हैं राम!

दीपावली के उजले प्रकाश में
देख रहे हैं राम
अपनी प्यारी अयोध्या को,
जन्मदात्री अयोध्या, बचपन के खेलों सी चपल अयोध्या!
सुदृढ़ होती बाजुओं के बीच सुरक्षित अनुभव करती अयोध्या!
और सीता के साथ प्रणय केलि की सी मीठी अयोध्या!

लौटे हैं १४ वर्षों के बाद
पर लौटना ठीक वहाँ कहाँ होता है
जिसे छोड़ कर जाता है व्यक्ति!
समय की कूची
यथार्थ के नये चित्र बनाती है
और स्मृति नये-पुराने के बीच अटक-अटक जाती है।
दोनों के अंतराल में बसता है
घटनाओं का अँधेरा।

राम यथार्थ देख रहे हैं
प्रौढ़ सी शांति है भाइयों के चेहरों पर
वैधव्य से झुक सी आईं हैं वृद्धा माँएँ
भय और आदर के बीच जयजयकार करती
एक पूरी नयी पीढ़ी खड़ी है चौदह साल के बाद!

राम लौट कहाँ पाये हैं
उस जानी पहचानी अयोध्या में?
यात्रा चाहे भीतर की हो
या बाहर की,
बहुत कुछ बदल देती है
अपने जाने और लौट कर आने के बीच,
यथार्थ और स्मृति के बीच,
एक नयी-पुरानी गंध बसी रहती है
जिसमें झूलता रहता है आदमी कुछ देर तक!

राम देख रहे हैं,
प्रजा की आँखें
तराजू के पलड़े बनी
तौल रही हैं उन्हें!
इस व्यस्क, रावण विजेता पुरुष में
अपने सुकुमार राम को
पहचानने की चेष्टा है उस दृष्टि में!

सोचते हैं, इस उत्साह सागर में
समय ने जो डाले हैं भँवर
वो करने ही होंगे पार
फिर एक बार!
फिर एक बार
पादुकाओं से नहीं
मानवीयता से राज्य चलाना होगा!
पुराने संबंधों के नये आयामों खोजने होंगे
बनाने होंगे राजमहल से
साधारण घर तक जाते सुन्दर रास्ते,
भय और आदर से भरे मनों की देहरी पर
कर्म और विश्वास का नये दीपक जलाने होंगे!

तब लौट पाऊँगा मैं
अपने मन में बसी अयोध्या में।

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