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बुद्ध नया

 

एक दिन के 
लिए ही सही 
चलो हम
‘बुद्ध’ हो जायें। 
 
ढूँढ़ें एक वट वृक्ष 
नया 
लगायें ‘बुद्ध’  जैसा 
ध्यान नया 
आधुनिकता के बड़े 
दुःखों का
ढूँढ़ें फिर उपचार नया, 
 
बचपन, युवा, 
रोग, बुढ़ापा 
फिर छोड़ जाता
रोता, बिलखता। 
चला जाता 
दुनिया से 
चार कंधों पर; बैठ कर
 
युग नया 
दुःख नया, 
वाहन नया, 
दुर्घटना का कारण नया, 
कोई रोग नया
तकनीक नयी
रोज़गार नया
तनाव नया
घुमाव नया। 
 
चलो जंगल 
घने जंगल 
भीतर, और भीतर 
कहता फ़ॉरेस्ट अफ़सर, 
भैया जाओ यहाँ से, अब नहीं उगता, 
कोई वट वृक्ष यहाँ। 
बूढ़े लोग अब गये, 
 
किसी और पेड़ 
के नीचे बैठ जाओ; ज्ञान जो मिलना होगा 
मिल जाएगा; 
नहीं तो यूनिवर्सिटी 
में दाख़िल हो 
पढ़ें बुद्ध को, 
न मिले ज्ञान नया, 
हिंट तो, 
मिल ही जायेगा, 
पीएच. डी. हो जायेगी, 
कमा लोगे फिर नाम
नया। 
बुद्ध का पुनर्जन्म हो
गया। 

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